"रोटी की जगह गोली: भूख के बदले मौत"



"रोटी की जगह गोली: भूख के बदले मौत"

11 जून 2025 की सुबह गाज़ा के लोगों के लिए एक और भयावह सुबह बन गई। जब दुनिया की अधिकांश आबादी सुबह की चाय के साथ अख़बार पढ़ रही थी, तब गाज़ा के गरीब और भूखे लोग खाने की तलाश में अपनी जान गंवा रहे थे।

इजरायली सेना ने उस दिन कम से कम 60 फिलिस्तीनियों को मौत के घाट उतार दिया। मरने वालों में ज़्यादातर वे लोग थे जो अमेरिकी-इजरायली सहायता कार्यक्रम के तहत बंटने वाले भोजन को लेने पहुंचे थे। उनके हाथों में बर्तन थे, न कि हथियार। उनकी आँखों में भूख थी, न कि हिंसा। मगर जवाब में उन्हें मिली गोलियाँ।

यह कैसी दुनिया है जहाँ रोटी की माँग पर इनाम की जगह मौत मिलती है?

उन मासूमों का कसूर क्या था? क्या उनका भूखा होना ही उनकी सबसे बड़ी गलती बन गया? क्या उनका गरीब होना ही उनके जीवन का अपराध था?

जब एक बच्चा अपनी माँ की गोद में भूख से तड़पता है और माँ की आँखें उसे चुप कराने में असहाय हो जाती हैं, तब युद्ध सिर्फ सीमा पर नहीं होता—वह दिलों में होता है, इंसानियत की लाश पर होता है।

हमारी चुप्पी भी भागीदार है इस हत्याकांड में।

द गार्जियन के अनुसार, यह हमला तब हुआ जब लोग भोजन वितरण योजना के तहत खाना लेने आए थे। क्या युद्ध में भी अब खाने के अधिकार को छीनना जायज़ हो गया है?

यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है—60 लाशें, 60 अधूरी कहानियाँ, 60 उजड़े हुए परिवार, 60 माताओं की चीखें, और अनगिनत सवाल जिनके जवाब शायद इतिहास भी न दे पाए।

आज ज़रूरत है इंसानियत की, न्याय की और आवाज़ उठाने की।

क्योंकि अगर आज हम नहीं बोले, तो कल किसी और की जगह हमारी बारी होगी।


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