मुक्ति
मुक्ति एक आत्ममंथन मुक्ति स्वरित होती है, मुक्ति मुखरित होती है, मुक्ति मिलती भी है— ख़ुद से या किसी व्यक्ति-विशेष से, प्रश्न वही है। मुक्ति क्यों चाहिए? क्योंकि हम स्वयं से परेशान हैं, भीतर का क्रोध बाहर उमड़ता है, मन में द्वेष, ईर्ष्या और अहंकार पलता है। हम दूसरों को बदलने में लगे रहे, पर ख़ुद को बदल न सके, अपने ही भीतर की कैद से कभी मुक्त हो न सके। समस्या वही है— मुक्ति मिल गई किसी व्यक्ति-विशेष से, तो फिर क्या? हम तो वहीं के वहीं रह गए, केवल चेहरे बदले, केवल परिस्थितियाँ बदलीं, पर हमारे भीतर की दुनिया ज्यों की त्यों रह गई। सचमुच मुक्ति मिली किसे? उस व्यक्ति को, जिससे हम मुक्त हुए, या हमें, जो उससे दूर हुए? और यदि हमारे भीतर वही क्रोध, वही घृणा, वही अहंकार शेष है, तो मुक्ति का अर्थ ही क्या है? फिर हम आएँ या न आएँ, अपनी इच्छा से जाएँ या विवश होकर, हम तो वहीं रह गए, क्योंकि हम मुक्त हुए ही कहाँ थे अपनी बुराइयों से, अपने भ्रमों से, अपने ही बनाए बंधनों से? जगत बीत गया, कई युग बदल गए,...