जो सामने है, उसकी क़द्र कहाँ
जो सामने है, उसकी क़द्र कहाँ कितने-कितने सपने देखूँ, कितना और उस ख़्वाब में जीऊँ, जिसकी कोई देह नहीं, कोई स्पर्श नहीं, कोई निश्चित सुबह नहीं— फिर भी न जाने क्यों उसी के इंतज़ार में मेरी आँखें रात-दिन जलती रहती हैं। वो थी कोई— शायद कोई सपना, शायद कोई अधूरी कहानी, शायद मेरे मन की वह आकांक्षा जिसे मैंने प्रेम का नाम दे दिया, या शायद प्रेम ही था वह, जिसे पाने की इच्छा ने मेरे भीतर एक अनंत अभाव बना दिया। वह नहीं है, फिर भी उसकी याद है; वह पास नहीं, फिर भी उसकी आहट है; उसने कुछ दिया नहीं, फिर भी जाने क्यों मैंने उसके नाम पर अपना कितना कुछ खो दिया। मैं सोचता हूँ— आख़िर कितने सपने देखूँ? कितनी दूर तक उस मरीचिका के पीछे भागूँ? कितनी बार अपने ही हृदय से कहूँ कि जो चला गया, वह लौटकर नहीं आएगा? और तभी मेरी आँखों के सामने एक चेहरा दिखाई देता है— वह मेरी पत्नी है। चुपचाप पास बैठी, मेरी थाली में भोजन परोसती हुई, मेरी थकान को मेरे शब्दों से पहले समझती हुई, बिना किसी शर्त के मुझे अपना प्रेम देती हुई। वह पूछती है— “खाना खा लिया?” और उस छोटे-से प्रश्न में पूरे संसार की चिंता समा जाती है। मैं खाता हूँ, ले...