भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक चेतना का संगम: एक नई मानव सभ्यता की ओर
भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक चेतना का संगम: एक नई मानव सभ्यता की ओर पश्चिमी भौतिकवाद और पूर्वी आध्यात्मिकता कैसे मिलकर मानवता की सबसे बड़ी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं? लेखक: रुपेश रंजन एक मौलिक, विस्तृत एवं कॉपीराइट-मुक्त दार्शनिक और सामाजिक विमर्श प्रस्तावना : मानव सभ्यता की दो अधूरी यात्राएँ मानव सभ्यता ने हजारों वर्षों की अपनी यात्रा में ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, तकनीक, अर्थव्यवस्था और आध्यात्मिक चिंतन के अनेक आयाम विकसित किए हैं। इस यात्रा में विश्व की विभिन्न सभ्यताओं ने अपने-अपने ढंग से मानव जीवन को समझने, व्यवस्थित करने और बेहतर बनाने का प्रयास किया है। व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो पश्चिमी सभ्यता ने भौतिक विकास, वैज्ञानिक अनुसंधान, तार्किक चिंतन, औद्योगीकरण, आर्थिक संगठन और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया है। वहीं पूर्वी सभ्यताओं, विशेषकर भारतीय दार्शनिक परंपरा ने आत्मचेतना, आत्मानुशासन, ध्यान, करुणा, अनासक्ति, अहिंसा, सह-अस्तित्व और जीवन के परम अर्थ की खोज को विशेष महत्त्व दिया है। एक ओर मनुष्य ने प्रकृति के रहस्यों को समझने के लिए विज्ञान विकसित कि...