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घर के हिस्से और घर के अपने

घर के हिस्से और घर के अपने — रुपेश रंजन किसी को घर के दो टुकड़े चाहिए, किसी को चार हिस्सों की दरकार है।  किसी को सबसे बड़ा कमरा चाहिए,  किसी को रसोई पर अपना अधिकार है। किसी को दीवारों की लंबाई नापनी है,  किसी को आँगन की सीमाएँ तय करनी हैं।  किसी को छत का हिस्सा बड़ा चाहिए,  किसी को खिड़कियों पर अपने नाम लिखने हैं। मगर किसी को बस लोग चाहिए घर में,  कुछ परिचित आवाज़ें,  कुछ पुराने संवाद।  किसी को बस घर चाहिए,  न कोई हिस्सा, न कोई विवाद। किसी को माँ-बाप का साया चाहिए,  किसी को भाई-बहनों का साथ। किसी को वही पुरानी चौखट चाहिए,  जहाँ बीत जाती थी हँसते हुए रात। किसी को माँ की पुकार सुननी है, किसी को पिता की डाँट में छिपा प्यार।  किसी को भाई के साथ की शरारतें चाहिए,  किसी को बहन का वह निश्छल दुलार। कितनी मेहनत से बना है यह घर, किसी एक व्यक्ति की कमाई से नहीं।  किसी ने ईंटें ढोईं,  किसी ने सपने सँजोए,  किसी ने अपना सुख छोड़ा,  किसी ने नींद नहीं ली। किसी के पसीने ने इसकी नींव सींची,  किसी की तपस्या ने इसकी द...

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