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बस लिखता रहूँ...

बस लिखता रहूँ... मन करता है,  लिखता ही रहूँ,  बस लिखता ही रहूँ,  बिना किसी विराम के,  बिना किसी परिणाम की आकांक्षा के,  अनवरत, अविराम, अनंत... जो कह नहीं पाया किसी से,  उसे शब्दों में ढालता रहूँ,  जो भीतर कहीं टूटता-बिखरता रहे,  उसे काग़ज़ पर सँभालता रहूँ। कभी स्मृतियों की स्याही से,  कभी पीड़ा की कलम लेकर,  कभी प्रेम के कोमल स्पर्श से,  कभी विरह की अग्नि में जलकर। न कोई मंज़िल हो,  न कोई अंतिम पृष्ठ,  न प्रसिद्धि की अभिलाषा,  न प्रशंसा की कोई तृष्णा। बस मन के भीतर जो उमड़ता है,  उसे निर्झर-सा बहने दूँ,  जो जीवन कहकर भी न कह सका,  उसे कविता बनकर रहने दूँ। जब तक साँसों में स्पंदन है,  जब तक चेतना में कोई हलचल है,  जब तक भीतर एक संसार जीवित है,  तब तक शब्दों का यह सफ़र अविरल है। मन करता है, लिखता ही रहूँ... क्योंकि शायद लिखना ही वह माध्यम है,  जिसमें मैं स्वयं से मिलता हूँ,  और स्वयं से बिछुड़ता भी नहीं।

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