कब जवाब माँगेगा इंसान
कब जवाब माँगेगा इंसान कब जवाब माँगेगा इंसान, इस अंदर से मर चुकी सरकार से? जो कुर्सियों पर तो बैठी है, पर दूर है जन-जन के संसार से। जब आँसू भी आँकड़ों में बदल जाएँ, जब पीड़ा केवल समाचार बन जाए, जब भूख का प्रश्न भाषणों में खो जाए, तब मौन भी अपराध कहलाए। कब पूछेगा वह— क्यों सपनों की कीमत इतनी सस्ती है? क्यों मेहनतकश की हथेली खाली है, और वादों की तिजोरी भरती रहती है? कब पूछेगा— क्यों न्याय की राह इतनी लंबी है? क्यों सच बोलने वाला अकेला पड़ जाता है, और झूठ अक्सर भीड़ का सहारा पा लेता है? यह प्रश्न किसी एक चेहरे से नहीं, हर उस व्यवस्था से है जो संवेदना खोकर केवल सत्ता का चेहरा बन गई। सरकारें आती हैं, जाती हैं, पर राष्ट्र उनसे बड़ा होता है। कुर्सी की उम्र कुछ वर्षों की होती है, जनता का विश्वास सदियों का होता है। जिस दिन नागरिक अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी पहचान लेगा, उसी दिन हर सत्ता जनता के सामने उत्तरदायी हो जाएगी। मत डर प्रश्न करने से, लोकतंत्र की साँस प्रश्नों से ही चलती है। मौन यदि स्थायी हो जाए, तो अन्याय बोलने लगता है। कब जवाब माँगे...