जब डिजिटल दुनिया पहले मुफ्त लगती है और फिर महँगी होने लगती है: क्या इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं का भविष्य केवल मुनाफे का बाजार है?
जब डिजिटल दुनिया पहले मुफ्त लगती है और फिर महँगी होने लगती है: क्या इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं का भविष्य केवल मुनाफे का बाजार है? आज हमारे हाथ में स्मार्टफोन है, जेब में डिजिटल भुगतान है, पढ़ाई मोबाइल पर है, नौकरी की जानकारी इंटरनेट पर है, सरकारी सेवाएँ ऑनलाइन हैं और रिश्तों का बड़ा हिस्सा WhatsApp जैसे प्लेटफॉर्म पर चलता है। हमने डिजिटल दुनिया को केवल तकनीक नहीं माना—हमने उसे जीवन का हिस्सा बना लिया है। लेकिन यहीं से एक महत्वपूर्ण आर्थिक प्रश्न पैदा होता है: अगर कोई डिजिटल सेवा पहले मुफ्त या बेहद सस्ती होकर हमारी आदत और निर्भरता बन जाए, और बाद में उसी सेवा के लिए शुल्क बढ़ने लगे, तो क्या यह केवल सामान्य बाजार-व्यवस्था है या डिजिटल अर्थव्यवस्था का एक नया व्यावसायिक मॉडल? यह प्रश्न WhatsApp, UPI या मोबाइल इंटरनेट तक सीमित नहीं है। यह उस बड़े सवाल से जुड़ा है कि डिजिटल भारत किसके लिए बनाया जा रहा है—नागरिकों की सुविधा और सामाजिक कल्याण के लिए, या मुख्यतः डिजिटल बाजार के विस्तार और निजी मुनाफे के लिए? पहले एक जरूरी तथ्य: WhatsApp संदेशों पर अभी शुल्क नहीं है सोशल मीडिया पर कभी-कभी यह दावा द...