जो रह गए, वे असीम दर्द के साथ रह गए
जो रह गए, वे असीम दर्द के साथ रह गए — रुपेश रंजन लोग आए, चले गए, कुछ पल ठहरे, फिर समय की धूल में ढल गए। कुछ ने मुस्कुराकर विदा ली, कुछ बिना कुछ कहे ही बदल गए। और कुछ ऐसे भी थे, जो जाते-जाते हमारे भीतर एक अधूरी उम्र छोड़ गए। लोग आए, चले गए, मगर जो रह गए, वे कहाँ जा सके? वे तो उन्हीं स्मृतियों के उजाड़ में ठहर गए, जहाँ कभी किसी के होने से रौनक़ थी, जहाँ किसी की हँसी से सुबह होती थी, जहाँ किसी की आवाज़ में अपने होने का अर्थ मिलता था। अब वहाँ सन्नाटा है, और सन्नाटे के भीतर एक अनंत प्रतिध्वनि— जैसे कोई पुकारता हो दूर से, जैसे कोई लौटने का वादा करके कभी लौटना ही भूल गया हो। जो चले गए, उनके पास रास्ते थे, जो रह गए, उनके पास यादें हैं। वे आगे बढ़ गए नई मंज़िलों की ओर, हम वहीं खड़े हैं, जहाँ कभी बिछड़ने का पहला क्षण हमारी पूरी दुनिया निगल गया था। अजीब है न यह जीवन— जाने वालों के लिए रास्ते खुलते हैं, रह जाने वालों के लिए बीते हुए समय के दरवाज़े भी बंद नहीं होते। वे हर रोज़ उसी चौखट पर लौटते हैं, जहाँ किसी ने अंतिम बार कहा था— फिर मिलेंगे। और हम आज तक उस एक वाक्य की उम्र गिन रहे हैं। हमेशा ...