वह केवल स्त्री नहीं, एक सम्पूर्ण संसार है
वह केवल स्त्री नहीं, एक सम्पूर्ण संसार है वह केवल स्त्री नहीं, एक सम्पूर्ण संसार है। उसके भीतर प्रेम की नदियाँ बहती हैं, संघर्ष के पर्वत खड़े रहते हैं, और उम्मीद का आकाश हर अंधेरे के बाद भी नीला बना रहता है। वह जन्म लेती है तो घर में एक नई धड़कन उतरती है। उसकी छोटी-सी हँसी दीवारों को भी जीवित कर देती है। उसकी उँगलियाँ जब किसी का हाथ पकड़ती हैं, तो लगता है जीवन ने पहली बार ममता को छुआ है। लेकिन दुनिया उसे बहुत जल्दी अपनी कठोरता सिखा देती है। उसे बताया जाता है— धीरे बोलो, सिर झुकाकर चलो, अपने सपनों को इतनी ऊँचाई मत दो। जैसे उसकी उड़ान किसी को भयभीत करती हो। लेकिन उसके भीतर एक ऐसी रोशनी होती है जो हर अंधेरे से लड़ना जानती है। वह बड़ी होती है, और अपने साथ घर की उम्मीदें भी उठाती है। वह अपने हिस्से की थकान छुपाकर दूसरों की मुस्कान बचाती है। वह माँ की चुप्पियों को समझती है, पिता की आँखों की चिंता पढ़ लेती है, और फिर भी अपने आँसू अक्सर तकिए में छुपा देती है। वह पढ़ती है, अपने सपनों को शब्द देती है, और धीरे-धीरे अपने भीतर की शक्ति पहचानने लगती है। वह डॉक्टर बनती है तो किसी की साँस बच जाती है। ...