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देश को बदलाव चाहिए — केवल विकास के आंकड़े नहीं

देश को बदलाव चाहिए — केवल विकास के आंकड़े नहीं रेलवे स्टेशन के फर्श पर सोते हुए लोग। किसी के पास चादर है, कोई अपने सामान को तकिया बनाकर लेटा है, कोई आने वाली ट्रेन का इंतजार कर रहा है। इनमें मजदूर हो सकते हैं, परिवार हो सकते हैं, दूर-दराज से यात्रा कर रहे सामान्य नागरिक हो सकते हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने जा रहे विद्यार्थी भी। चारों ओर रोशनी है। इमारत है। पंखे हैं। प्लेटफॉर्म हैं। रेलवे की विशाल व्यवस्था है। फिर भी मनुष्य फर्श पर सो रहा है। यही दृश्य एक बहुत बड़ा प्रश्न हमारे सामने रखता है— क्या विकास केवल बड़ी इमारतों, तेज ट्रेनों, राजमार्गों, डिजिटल तकनीक और आर्थिक आंकड़ों का नाम है, या विकास का वास्तविक अर्थ मनुष्य के जीवन में दिखाई देने वाली गरिमा भी है? विकास का वास्तविक अर्थ क्या है? किसी देश की प्रगति को केवल GDP, एक्सप्रेसवे, हवाई अड्डों, ऊंची इमारतों, डिजिटल सेवाओं या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापा जा सकता। ये सभी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन विकास का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा आम आदमी के जीवन में दिखाई देता है। वह रेलवे स्टेशन के प्रतीक्षालय में दिखाई देता है। सरकारी अस्पता...

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A Country Needs Change — Not Just Development on Paper

जब रेलवे स्टेशन बन जाता है शयनगृह: प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं का अनदेखा भारत

When the Railway Station Becomes a Dormitory: The Unseen India of Competitive Examination Aspirants

कुछ पता नहीं चलता...

वो कभी सामने आती है...

मेरे सामने वो बैठी है...

मैं एक सफ़र में हूँ,

तू आ जाए तो...

बारिश रुक भी जाए...

बारिश की हर बूँद में...

A Day in the Waiting Room

प्रतीक्षालय में एक दिन