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मौत की फ़रमाइश है लबों पर...

मौत की फ़रमाइश है लबों पर, पर दिल अब भी खामोश नहीं, ज़िंदगी से शिकवा तो है मगर, उससे पूरी बेरुख़ी भी नहीं। क़ैद-ए-हयात से थक चुका हूँ, ये साँसें बोझ सी लगती हैं, दे दो अगर आज़ादी तो बेहतर, वरना ये धड़कनें भी सज़ा सी लगती हैं।

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मौत ए फ़रमाइश है मेरी...

संध्या की वह मुलाक़ात

अधूरी बाँहें

मुस्कानों का उजाला

सिर्फ उजाला

रेखाओं के पार

इंतज़ार

अंतिम आलिंगन

किसी स्थान से कम नहीं होते

तुम आना दशकों बाद मुझसे मिलने...

जाना वहीं तक है...

मैं खुश हूँ तेरे साथ

सुकून छीन लिया है मेरी रातों का

तुम मिलते हो मुझसे