दर्द की उस सीमा पर...
दर्द की उस सीमा पर... मेरा दर्द इतना गहरा है भीतर, कि लोगों की बातें अब चुभती नहीं हैं। जिन शब्दों से कभी आत्मा काँप जाती थी, वे आज मेरे कानों तक पहुँचती नहीं हैं। मैं इतना कुछ सह चुका हूँ जीवन में, कि अपमान भी अब साधारण लगता है। जो आँधियाँ किसी को तोड़ देती हैं, मुझे उनका हर प्रहार परिचित लगता है। रातों ने मेरी आँखों से नींद छीनी, सपनों को बिखरते हुए देखा है मैंने। अपनों के बदलते हुए चेहरे, और विश्वास को मरते हुए देखा है मैंने। कई बार किस्मत ने मुझे पत्थरों की राह पर नंगे पाँव चलाया है। हर मोड़ पर संघर्ष का दरिया देकर, मुझे खुद से ही लड़ना सिखाया है। लोग सोचते हैं मैं खामोश हूँ, शायद इसलिए कि मेरे पास जवाब नहीं। पर सच तो यह है कि मेरे भीतर अब किसी शिकायत का हिसाब नहीं। जो व्यक्ति अपने आँसुओं को अंधेरी रातों में पीना सीख जाता है, वह दुनिया की कठोरता से नहीं डरता, वह हर तूफान में जीना सीख जाता है। मैंने देखा है उम्मीदों का टूटना, और फिर उन्हीं टुकड़ों से दीप जलाना। मैंने सीखा है गिरकर उठना, और राख से अपना अस्तित्व बनाना। अब यदि कोई मेरा उपहास करे, तो वह केवल हवा का शोर लगता ह...