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नैसर्गिक प्रेम

नैसर्गिक प्रेम निर्दयी थे वे लोग, जिन्होंने प्रेम को नैसर्गिक नहीं माना, जिसे हृदय ने स्वयं चुना, उसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया। उन्होंने पूछे प्रेम से प्रमाण— किस अधिकार से आए हो, किस संबंध के नाम से तुम्हें पुकारें? वे भूल गए कि फूल खिलने से पहले किसी से अनुमति नहीं लेते, नदियाँ बहने से पहले किनारों की स्वीकृति नहीं माँगतीं, और हवा को भी दिशाओं से कोई अनुबंध नहीं होता। फिर प्रेम क्यों माँगे समाज की मुहर? प्रेम तो हृदय की वह अनाम धड़कन है, जो तर्क से पहले जन्म लेती है, शब्दों से पहले समझ आती है, और स्वीकार किए जाने से पहले ही मनुष्य के भीतर अपना घर बना लेती है। निर्दयी थे वे, जिन्होंने प्रेम को अपराध की तरह देखा, उसकी पवित्रता को परंपराओं की चौखट पर तौला, और दो धड़कनों के बीच दीवार खड़ी कर दी। उन्होंने नहीं जाना— प्रेम किसी व्यवस्था का उपहार नहीं है, न किसी विधान की देन, न किसी समाज की अनुमति। वह तो मनुष्य के भीतर मनुष्य होने की सबसे प्राचीन अनुभूति है। जिसे तुम रोक सकते हो, उसका मिलन रोक सकते हो, उसकी राह रोक सकते हो, उसकी आवाज़ दबा सकते हो— पर उस प्रेम को कैसे रोकोगे जो एक बार आत्म...

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