अब गाँव किससे मिलने जाऊँगा
अब गाँव किससे मिलने जाऊँगा — रुपेश रंजन वो भी चले गए, जिनके होने से बहुत कुछ था, अब सब कुछ होते हुए भी जैसे कुछ शेष नहीं रहा। एक अजीब-सा सन्नाटा है भीतर, जैसे किसी ने आत्मा के आँगन से सारी आवाज़ें समेट ली हों, और स्मृतियों के दरवाज़े पर उदासी का पहरा बिठा दिया हो। बहुत दर्द होता है, बार-बार आँखें भर आती हैं, अश्रुओं की अविरल धारा भी मन का बोझ कहाँ घटा पाती है? रो लेता हूँ जी भरकर, फिर भी वहीं खड़ा रह जाता हूँ, जैसे समय आगे बढ़ता रहता है और मैं अतीत में छूट जाता हूँ। यह प्रहार केवल किसी व्यक्ति पर नहीं, मेरी जड़ों पर हुआ है, वह वृक्ष, जिसकी छाया में मैंने अपने होने का अर्थ खोजा, आज उसी की शाखाओं पर विरह का मौसम ठहरा हुआ है। गाँव का वह घर, जो कभी केवल मकान नहीं था, मेरे अस्तित्व का आधार था, मेरी स्मृतियों का संसार था, मेरी वापसी का सबसे सुंदर कारण, मेरे होने का एक स्वीकार था। अब वहाँ जाऊँगा तो क्या देखूँगा? दीवारें होंगी, आँगन होगा, वही पुराना दरवाज़ा होगा, शायद धूप भी पहले जैसी उतरेगी, शाम को चिड़िय...