अब खामोशी अपराध है...
अब खामोशी अपराध है हर सुबह एक नई चीख, हर शाम एक नया मातम। कब तक अख़बारों में पढ़ेंगे इंसानियत का रोज़ का दाह-संस्कार? कहीं बेटी की अस्मिता लूटी जाती है, कहीं बचपन का दम घुट जाता है। कहीं कानून की राह लंबी पड़ती है, कहीं अपराधी हँसता हुआ लौट जाता है। मत कहो— "यह तो होता रहता है।" यही एक वाक्य हर अपराधी का सबसे बड़ा हथियार है। याद रखो— बलात्कार केवल एक शरीर पर हमला नहीं, पूरे समाज की आत्मा पर किया गया प्रहार है। और अपराध केवल अपराधी नहीं करता, कभी-कभी हमारी चुप्पी भी उसका साथ देती है। अब समय है डर को नहीं, ज़मीर को जगाने का। बेटियों को कैद नहीं, समाज को संस्कार चाहिए। दीवारें ऊँची नहीं, चरित्र ऊँचा चाहिए। न्याय केवल किताबों में नहीं, ज़मीन पर दिखाई देना चाहिए। कानून का भय इतना गहरा हो कि अपराध सोचते ही हाथ काँप उठें। उठो! सवाल पूछो। अन्याय के सामने सिर मत झुकाओ। जो मौन है, वह परिवर्तन का नहीं, समस्या का हिस्सा बन जाता है। एक ऐसा भारत बनाओ जहाँ किसी माँ को अपनी बेटी की वापसी के लिए प्रार्थना न करनी पड़े। और याद रखो— अँधेरा अपराधी से नहीं बढ़ता, अँधेरा बढ़ता है जब अच्छे लोग चुप र...