मुक्ति नहीं है प्रेम में...
मुक्ति नहीं है प्रेम में मुक्ति नहीं है प्रेम में, यह बात अब समझ आई, वह भूल गई मुझे शायद, मगर मुझे उसकी याद आई। वह अपने समय के साथ चली, मैं स्मृतियों में ठहर गया, उसने एक अध्याय बंद किया, मैं उसी पृष्ठ पर बिखर गया। न कोई शिकायत है उससे, न कोई प्रश्न शेष रहा, बस एक अजीब-सी विडंबना है, वह भूल गई, मुझे याद रहा। मैंने बहुत प्रयास किया, इन स्मृतियों से दूर जाने का, अपने ही मन के भीतर कोई दूसरा संसार बसाने का। पर प्रेम कोई कारागार नहीं, जिसकी दीवारें तोड़ी जा सकें, न कोई ऐसा द्वार है, जिससे निकलकर फिर लौटा न जाए। मुक्ति मिल ही नहीं रही, कोई रास्ता दिखाई नहीं देता, जिसे भूल जाने की ठानी है, मन उसी को भुला नहीं पाता। शायद प्रेम का यही विधान है, कोई पाता है, कोई खोता है, एक के लिए बीता हुआ कल, दूसरे के भीतर आज भी होता है। और कितना विचित्र है यह प्रेम— दो लोग कभी एक कहानी थे, आज एक के लिए कुछ भी नहीं, और दूसरे के लिए पूरी ज़िंदगानी थे। न वह लौटने वाली है, न मैं उसे ब...