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संध्या की वह मुलाक़ात

संध्या की वह मुलाक़ात मुलाक़ात की उस सांवली घड़ी में, मन ने चाहा था तुम्हें बाँहों में भर लेना, पर समय की कठोर उँगलियों ने बस दृष्टि भर ठहरने की अनुमति दी। पटरियों पर ठहरी हुई शाम जैसे हमारे शब्दों को सुन रही थी, आकाश ने केसरिया चादर ओढ़ चुपचाप विदा का संकेत दिया। भीड़ के शोर में भी एक निस्तब्धता हमारे बीच थी, जिसमें अनकहे स्पर्शों की ऊष्मा धीरे-धीरे धड़कनों में उतर रही थी। तुम सामने थे— पर नियति की दूरी दो कदमों को सदियों-सी बना रही थी। मैंने आँखों से ही तुम्हारा चेहरा छू लिया, और स्मृतियों की हथेली पर वह क्षण सँभाल लिया। कभी फिर मिलेंगे— किसी और आकाश तले, जहाँ समय उदार होगा और आलिंगन अधूरा न रहेगा। रूपेश रंजन

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इंतज़ार

अंतिम आलिंगन

किसी स्थान से कम नहीं होते

तुम आना दशकों बाद मुझसे मिलने...

जाना वहीं तक है...

मैं खुश हूँ तेरे साथ

सुकून छीन लिया है मेरी रातों का

तुम मिलते हो मुझसे

रात भर जागता रहा मैं

वर्षों बाद भी