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रात जाग रही है...

रात जाग रही है रात जाग रही है किसी के पहलू में चुपचाप, जैसे कोई अधूरी प्रार्थना होंठों तक आकर ठहर गई हो। चाँद की धुंधली रोशनी में वह किसी के कंधे पर सिर रखे अपने ही ख्यालों से बातें करती है, और सितारे उसकी खामोशी का पहरा देते हैं। हवा की धीमी सरसराहट मानो उसके बालों को सहला रही हो, और समय थककर उसी आंचल में क्षणभर विश्राम ले रहा हो। रात जाग रही है— किसी की धड़कनों की लय में, किसी की साँसों की गरमाहट में, किसी अधूरे प्रेम की आहट में। वह सोती नहीं, क्योंकि सपनों का भार उसकी पलकों पर नहीं, उसके हृदय में टिका होता है। सुबह आएगी अवश्य, पर अभी— इस सघन निस्तब्धता में रात स्वयं एक कविता बनी किसी के पहलू में धीरे-धीरे धड़क रही है। रूपेश रंजन

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