ज़रूरी नहीं
ज़रूरी नहीं तू जो सोचता है, वैसा कुछ हो भी क्या, मैं जो सोचता हूँ, वो तुझे ठीक लगे भी क्या। बात इतनी-सी है, हर सोच सच नहीं होती, हर पसंद सही नहीं होती। जो अच्छा लगता है, तू वही सोचता है, जो मन को भाता है, उसे ही सच मानता है। लेकिन ज़रूरी नहीं कि वही सही हो, जो तुझे अच्छा लगे, वही हक़ीक़त हो। कभी अपनी सोच से बाहर भी देख, कभी दूसरे का सच भी समझ, क्योंकि दुनिया सिर्फ़ हमारी नज़र से नहीं चलती— सच कई दिशाओं में बँटा होता है, और हर सही बात हमें अच्छी लगे— ज़रूरी तो यह भी नहीं। Rupesh Ranjan