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लड़की का आगे बढ़ना आज भी कुछ आँखों को खलता है...

लड़की का आगे बढ़ना आज भी कुछ आँखों को खलता है, उसका आत्मविश्वास कई संकीर्ण विचारों को जलता है। जब वह चुप रहती है, समाज उसे संस्कारी कहता है, और जब सच बोलती है, तो उसे विद्रोही कहता है। सदियों से उसे त्याग का पाठ पढ़ाया गया, उसके सपनों को कर्तव्यों में उलझाया गया। उससे कहा गया कि सीमाएँ ही उसकी पहचान हैं, और समझौते ही उसके जीवन का सम्मान हैं। पर समय की धारा कब रुक पाई है, हर जंजीर एक दिन टूट ही गई है। जो आवाज़ें कभी दबा दी जाती थीं, आज वही परिवर्तन का शंखनाद बन जाती हैं। अब वह किसी की परछाईं बनकर नहीं चलेगी, अपने अस्तित्व की ज्योति स्वयं जलेगी। अब उसकी मंज़िल का निर्णय कोई और नहीं करेगा, उसके सपनों का आकाश कोई और नहीं घेरेगा। उसे डर दिखाकर रोकने वाले भूल जाते हैं, कि पर्वत भी नदियों का मार्ग नहीं रोक पाते हैं। नारी भी उसी प्रकृति की संतान है, उसके भीतर साहस का अथाह वरदान है। वह गिरती है, फिर उठती है, फिर आगे बढ़ती है, हर कठिनाई को अपनी शक्ति में गढ़ती है। उसकी मुस्कान में संघर्षों की कहानी होती है, उसकी सफलता में अनगिनत कुर्बानी होती है। समाज को अब अपनी सोच बदलनी...

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