दुविधा में भारत: पूँजीवाद, आधुनिकता और अपनी सभ्यतागत जड़ों की तलाश
दुविधा में भारत: पूँजीवाद, आधुनिकता और अपनी सभ्यतागत जड़ों की तलाश भारत आज एक गहरे सभ्यतागत मोड़ पर खड़ा है। एक ओर वह तीव्र आर्थिक विकास, उद्यमिता, तकनीक, वैश्वीकरण, निजी निवेश और बाजार-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से बढ़ रहा है; दूसरी ओर उसकी आत्मा उस प्राचीन सभ्यतागत परंपरा से निर्मित हुई है, जिसने मनुष्य के जीवन को केवल भौतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य, आत्मसंयम, करुणा, सह-अस्तित्व और आत्मबोध से भी परिभाषित किया। यही भारत की वर्तमान दुविधा है। हम आर्थिक रूप से अधिक पूँजीवादी होते जा रहे हैं, लेकिन हमारी सभ्यतागत चेतना केवल पूँजी संचय की चेतना नहीं रही है। पश्चिमी संस्कृति और जीवन-शैली का प्रभाव हमारे शहरों से निकलकर छोटे कस्बों और गाँवों तक पहुँच चुका है। उपभोग, ब्रांड, आय, संपत्ति, प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत सफलता आधुनिक जीवन के महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुके हैं। लेकिन प्रश्न यह है— क्या भारत आधुनिक बनते हुए अपनी आत्मा को बचा पाएगा? क्या वह आर्थिक रूप से समृद्ध होकर भी आध्यात्मिक रूप से निर्धन होने से बच सकता है? क्या वह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ...