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रूह-ए-करार बे-मोहब्बती क्या समझेंगे...

रूह-ए-करार बे-मोहब्बती क्या समझेंगे, रूह पिघल जाती है महबूब के दीदार से। रूपेश रंजन...  --------- रूह-ए-करार बे-मोहब्बती क्या समझेंगे, रूह पिघल जाती है महबूब के दीदार से। मन में बरसात उतर आती है, और दिल को सुकून मिलता है, बस एक मुस्कान, एक नज़र, और उस प्यारे से इज़हार से। रूपेश रंजन... 

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दर्द की उस सीमा पर...

कर्ण का मौन...

One day, you will come to me on your own...

एक दिन तुम खुद आओगी मेरे पास...

Suppose there were no waiting, Then what would love be?

मानो प्रतीक्षा नहीं, तो प्रेम कैसा?

You ask me, Why do I always come to you?

One day, the light in my eyes will begin to fade,

एक दिन मेरी आँखों की रोशनी धीमी पड़ जाएगी, मैं तुम्हें वैसे नहीं देख पाऊँगा जैसे आज देखता हूँ।

तुम पूछते हो, मैं तुम्हारे पास ही क्यों चला आता हूँ?

केवल लोग नहीं, व्यवस्था भी बदलनी होगी: राष्ट्र की प्रगति का वास्तविक मार्ग

People Are Not the Problem Alone: Systemic Reforms Are the Real Key to National Progress

राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों को जाति की राजनीति से ऊपर उठना होगा, तभी वे राष्ट्रीय दलों से प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे

State Political Parties Must Rise Above Caste Politics to Remain Relevant in a Changing India