अधिकार, कानून और जिम्मेदारी: क्या केवल कानून से समाज बदल सकता है?
अधिकार, कानून और जिम्मेदारी: क्या केवल कानून से समाज बदल सकता है? हर लोकतांत्रिक समाज में अधिकारों की माँग स्वाभाविक है। नागरिकों की सुरक्षा, गरिमा और स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए कानून आवश्यक हैं। लेकिन एक मूलभूत प्रश्न है जिस पर हम अक्सर विचार नहीं करते—क्या केवल कानून बनाकर समाज को बदला जा सकता है? मेरा उत्तर है—नहीं। कानून समाज की रक्षा करते हैं, लेकिन समाज का निर्माण नहीं करते। वे अपराध होने के बाद न्याय दिलाने का माध्यम हैं; अपराध होने से पहले चरित्र निर्माण का साधन नहीं। आज किसी भी बड़ी घटना के बाद सबसे पहली माँग होती है—नया कानून बनाइए, सजा और कठोर कीजिए, नई धाराएँ जोड़िए। कुछ समय के लिए इससे लोगों को लगता है कि सरकार ने कार्रवाई कर दी। लेकिन क्या इससे समस्या की जड़ समाप्त हो जाती है? यदि ऐसा होता, तो नए-नए कानून बनने के बाद भी अपराध दोबारा क्यों होते? वास्तविक समस्या कानूनों की कमी नहीं, बल्कि शिक्षा, नैतिकता, सामाजिक चेतना और जिम्मेदारी की कमी है। अधिकार तभी सार्थक हैं जब उनके साथ कर्तव्य और जिम्मेदारी भी जुड़ी हो। यदि किसी व्यक्ति को अधिकार तो मिल जाएँ, लेकिन उसे यह न सि...