"मेरी प्रियतमा…"



"मेरी प्रियतमा…"

तुम्हारे बिना जीवन
जैसे अधूरी रचना है —
जिसमें संगीत है, मगर सुर नहीं,
जिसमें शब्द हैं, मगर भाव नहीं।

हर सुबह मेरी आँखें
तुम्हें देखे बिना अधूरी रह जाती हैं,
हर रात तुम्हारे ख्वाब में
मैं खुद को तुम्हारे करीब महसूस करता हूँ —
बस तुम्हारे पास…
इतना पास कि मेरे स्पर्श से
तुम्हारे रोंगटे खड़े हो जाएँ।

तुमसे आलिंगन करने को
मेरा रोम-रोम मचलता है।
तुम्हारे गर्म और मुलायम बदन से
लगकर मैं हर दर्द भूल जाना चाहता हूँ।
जब तुम मेरी बाँहों में समा जाओ,
तो मुझे लगे —
जैसे सृष्टि का हर आनंद,
हर सुख, हर स्वाद
अब मेरे पास है।

मैं बेचैन हूँ तुम्हारे प्रेम में —
दिन में तुम्हारी आँखें
मेरे ज़हन में तैरती हैं,
और रात को तुम्हारी देह की कल्पना
मेरी साँसों को तेज कर देती है।

तुम्हारे अधरों का स्पर्श,
उनकी नमी, उनकी गहराई —
जैसे मधुर मधुशाला से निकला पहला घूँट,
जिसे मैं पीकर
अपने होश खो देना चाहता हूँ।

मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे अधरों पर
मेरे होंठ रुक जाएँ,
हर एक सांस के साथ
तेरी देह की भाषा पढ़ता जाऊँ।
तेरे सीने की लहरों पर
अपनी उंगलियों से प्रेम के अक्षर लिखूं —
और तुम्हारी रूह तक
अपने एहसास की गर्मी पहुँचा दूँ।

तुम्हारे बदन की खुशबू
मुझे पागल कर देती है।
तुम्हारे कंधों से लेकर
तुम्हारी कमर तक
मैं प्रेम की यात्रा करना चाहता हूँ —
हर मोड़ पर तुम्हें महसूस करना,
हर मोड़ पर तुम्हें चूमना।

आज रात मैं कुछ नहीं कहना चाहता —
बस तुम्हारे शरीर की भाषा को
समझना चाहता हूँ।
तेरे साथ हर बंधन तोड़ना चाहता हूँ,
और तेरे भीतर
अपने प्यार की गहराई छोड़ देना चाहता हूँ।

आओ प्रियतमा,
आज शब्दों को विराम दें,
और देह की बातों को
मौन की भाषा में होने दें।
तेरे संग
मैं खुद को खो देना चाहता हूँ —
तेरी गर्म साँसों में,
तेरे गीले अधरों में,
तेरी काँपती उंगलियों में,
तेरी भीगी रूह में...

तू मेरी प्यास है,
मैं तेरा समर्पण।
आज रात,
हम दोनों एक-दूसरे में
पूर्ण हो जाएँ…



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