कोई नहीं मरता


न तू किसी का जन्म है,
न तू किसी की मृत्यु है।
अविनाशी आत्मा है तू,
बस माया में व्यस्त त्रुटि है।

शरीर बदलता है केवल,
जैसे वस्त्र पुराने छोड़ दे।
पर आत्मा न जलती, न कटती,
ना वह जन्म लेती, ना वह मरे।

जो गया, वो कहीं गया नहीं,
वो बस रूप बदल चला।
जिसे तुम मृत्यु कहते हो,
वो जीवन का नया चक्र चला।

गीता कहती – शोक मत कर,
न कोई तेरा, न तू किसी का।
जो आत्मा शुद्ध, अनादि है,
उसे क्या भय, क्या किसी का डर?

मरण नहीं है अंत कभी,
ये तो बस परिवर्तन है।
जैसे रात्रि के बाद सवेरा,
वैसे मृत्यु के बाद पुनर्जन्म है।

जो आया है, वो जाएगा,
पर "वह" – जो भीतर है – रहेगा।
कोई नहीं मरता इस जग में,
बस आत्मा नया पथ लेती है सदा।



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