प्रेम और बुद्धि का द्वंद्व...

प्रेम और बुद्धि का द्वंद्व

प्रेम में दिमाग नहीं चलता,
यह दिल की राहों से निकलता।
जो सोच में उलझे रहते हैं,
वो इश्क़ का रंग कहाँ समझते हैं?

गिनती करके दिल नहीं खुलता,
भावों का सागर यूँ नहीं उबलता।
जो हर कदम पर सोचते रहे,
वो प्रेम की आग में जलते नहीं।

प्रेम तो पागलपन की तरह है,
जो खुद को मिटा दे वही सच्चा है।
जहाँ मैं-मेरा मिट जाए पूरा,
वहीं से शुरू हो प्रेम का रास्ता।

जो जीवन में सच्चा प्रेम न पा सके,
वो जैसे साँसें लेता हुआ पत्थर ही रहे।
धड़कनें तो होंगी, पर अर्थ कहाँ?
बिना प्रेम के, जीवन भी व्यर्थ कहाँ?

तो छोड़ दो बुद्धि के जालों को,
डूब जाओ उस नादान सवालों को।
प्रेम में बस बहना आता है,
जो बह गया, वही पाता है।

रूपेश रंजन


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