प्रेम का स्वभाव (एक कविता)

प्रेम का स्वभाव
(एक कविता)

प्रेम किया, बस यूँ ही किया,
किसी शर्त पे नहीं जिया।
न चाहा बंधन का वो नाम,
न मांगा बदले में कोई काम।

हर रिश्ते में भाव भरे थे,
कभी कम, कभी ज्यादा गहरे थे।
जिनके संग था रोज का साथ,
उनसे जुड़ाव था कुछ खास बात।

जिनसे दूरी रही समय की,
उनसे भी थी एक कसक मिठास सी।
पर प्रेम तो प्रेम ही होता है,
हर रूप में बहता, खोता है।

नदी सा बहता, पवन सा उड़ता,
फूल सा खिला, बिना कुछ कहे जुड़ता।
कर्म नहीं, ये व्यवहार है,
प्रकृति का ही उपहार है।

इसलिए मैंने प्रेम किया,
नहीं किसी को अपना कहा।
जो साथ चला, उससे स्नेह किया,
जो दूर गया, उसे भी नम्रता से विदा दिया।

प्रेम को मैंने पूजा नहीं,
बस उसे जीया —
मुक्त, निर्मल,
जैसे कोई साँस।

— ✍️ रूपेश


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