कब मिलोगे प्रिय?



🌌 कब मिलोगे प्रिय? 🌌

कब मिलोगे प्रिय?
तुम आज आकाश को निहार रहे हो,
और मैं—
मैं उस आकाश की आँखों में
वही पीड़ा महसूस करता हूँ,
वही तन्हाई, वही मौन व्यथा—
जो हर रौशनी में मेरा नाम पुकारती है।

हे सर्वशक्तिमान,
यदि इस धरा पर नहीं,
तो उस क्षितिज के पार कहीं—
जहाँ सृष्टि की अंतिम साँस थमती हो,
जहाँ समय भी झुक जाता हो,
वहाँ हमारे प्राणों को
एक दूजे से मिलने देना।

यह पृथ्वी हमारी सीमा नहीं,
हम मिट्टी और मांस से नहीं बने,
हम तो उस प्रेम से बने हैं
जो मृत्यु से परे है,
जो जन्मों के पार है।

यदि ब्रह्मांड को घूमना पड़े,
तारों को बुझना पड़े,
तो बुझ जाएँ—
पर उस एक पल में
मुझे तुमसे फिर मिलना हो,
तुम्हारा फिर से होना हो।

तब तक मैं
तारों से बातें करता रहूँगा,
और उनकी रौशनी में सो जाऊँगा—
उम्मीद करता हूँ
तुम भी उस रात की ओर देख रही हो।


Rupesh Ranjan


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