तुम क्या समझोगी… दर्द की सच्चाई...

तुम क्या समझोगी… दर्द की सच्चाई,
तुम्हें तो कोई और मिल गया… और तुम बदल गई।

मेरे अश्क़ों की कीमत तुम कहाँ जान पाती,
तुम्हारे झूठे वादों को मैं सच मान बैठा था।

जिस हाथ को पकड़कर उम्रभर का सफ़र तय करना चाहा,
वही हाथ किसी और के हाथों में तुमने थमा दिया।

जिस भरोसे पर मैंने अपनी ज़िन्दगी टिका दी थी,
उस भरोसे को तुमने रेत की तरह फिसला दिया।

तुम्हारे हर झूठ को मैंने मोहब्बत समझा,
तुम्हारे हर दर्द को मैंने अपना कहा।

पर तुमने तो मेरी वफ़ा का मज़ाक बना दिया,
मेरा दिल तोड़ा और किसी और को अपना लिया।

आज भी मेरी तन्हाई तेरे नाम से रोती है,
तेरी यादें हर रात मेरी रूह को खोती हैं।

तूने जो ज़ख्म दिए, वो अब तक हरे हैं,
तेरे बाद भी मेरे दिन वीरान, मेरे सन्नाटे गहरे हैं।

मेरी मोहब्बत तेरे लिए खेल बनकर रह गई,
मेरी चाहत तेरे लिए बोझा बनकर रह गई।

तू बदल गई, मगर मैं आज भी वही हूँ,
तेरे नाम पर रोता, तेरा दीवाना अधूरा सा सही हूँ।

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