"आज़ादी का बोझ"

"आज़ादी का बोझ"

आज़ादी, आज़ादी, आज़ादी—
थक गया हूँ कमबख़्त ये सुन-सुन के।
हर गली, हर चौक, हर मंच पर
सिर्फ़ यही नाम गूंजता है।

पर मैं सोचता हूँ—
क्या सचमुच इतनी ज़रूरत है इसकी?
क्या हर रिश्ते, हर डोर को तोड़कर
सांस लेना ही आज़ादी है?

ज़रा ग़ुलाम भी बना दो मुझे,
अपनी ही आज़ादी का—
ताकि जान सकूँ कि क़ैद में भी
मोहब्बत की ख़ुशबू कैद नहीं होती।

आज़ादी की चीखों में
रिश्तों की सरगोशियाँ दब जाती हैं।
पर ग़ुलामी की गिरह में भी
कभी-कभी अपनापन पनपता है।

मुझे वो आज़ादी नहीं चाहिए
जो तन्हाई की दीवार खड़ी करे,
मुझे तो वही ग़ुलामी मंज़ूर है
जिसमें तेरी मुस्कान मेरा हुक्मनाम हो।

आज़ादी का भी बोझ भारी है,
और ग़ुलामी का भी एक स्वाद है—
पर सच्चाई ये है कि
इंसान दरअसल किसी का नहीं,
बस अपने दिल का क़ैदी होता है।

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