चापलूसी के राज्य में...

चापलूसी के राज्य में

जहाँ राजसिंहासन की सीढ़ियों पर
सत्य का रक्त टपकता हो,
और दरबार में झूठ के चंदन से
अधिपति का मस्तक सजता हो —
वहाँ भविष्य केवल भय है।

जहाँ शिलालेखों पर
सिर्फ़ प्रशस्तियाँ गढ़ी जाती हों,
जहाँ कवि की कलम
न्याय नहीं,
सिर्फ़ दरबारी गीत लिखती हो —
वहाँ आत्मा मर जाती है।

इतिहास गवाह है —
दुर्योधन के दरबार में
सत्य बोलने वाले
विदुर जैसे अकेले थे;
जयचंद की चापलूसी ने
पृथ्वीराज को असहाय किया;
और जब मीरजाफ़र की
झूठी वफ़ादारी फूटी
तो बंगाल की धरती लहूलुहान हो गई।

जो राज्य
अपनी आलोचना सुनना भूल जाए,
जो राजा
सत्य के दर्पण को तोड़ दे,
वह राज्य धीरे-धीरे
अपने ही बोझ से गिरता है।

जहाँ दरबारी कवि
झूठी वीरगाथाएँ गाते हों,
जहाँ दर्पणों में
सिर्फ़ अधिपति का सौंदर्य दिखे,
जहाँ बुद्धिजीवी
अपना मस्तक झुकाकर
स्वतंत्र विचार को बेच दें —
वहाँ जनता की आत्मा
कभी आज़ाद नहीं रह सकती।

याद करो —
रोम का पतन,
जहाँ सम्राट की झूठी महानता
संगमरमर में कैद थी;
याद करो —
मुग़ल दरबार के आख़िरी साल,
जहाँ आलसी चापलूसों ने
सिंहासन को खोखला कर दिया।

राज्य को मजबूत करता है
सत्य, न्याय और जनहित;
सिंहासन को स्थायी बनाता है
खुले विचार, आलोचना और सुधार;
और राज्य को नष्ट करता है
अहंकार, अंध-भक्ति, चापलूसी।

हे नागरिको,
सिंहासन के आगे झुकना नहीं,
सत्य को सत्ता से ऊँचा रखना;
यही राष्ट्र की रक्षा है,
यही इतिहास का संदेश है।

क्योंकि
जो राज्य
अपने नागरिकों से केवल
झूठी वाहवाही चाहता है,
वह राज्य
अंततः अपनी नींव खो देता है।

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