करुणामय राम

करुणामय राम



राम! तेरा नाम ही मंत्र है,
तेरी भक्ति ही जीवन कंठ है।
तेरे बिना सब सूना–सूना,
तेरे संग ही सब सुंदर–सुंदर।

शबरी की झोपड़ी जब तू आया,
उसके बेरों का रस चखा,
हे करुणामय! तेरे चरणों से,
उसका जीवन पुष्प खिला।

नागरी, वनवासी, साधु सभी,
तेरे दर्शन से तृप्त हुए,
जाति–पांत सब मिट गए,
तेरे प्रेम–सागर में लिप्त हुए।

कैकेयी ने जब कठोर कहा,
वन जाना होगा चौदह बरस,
तूने हँसकर स्वीकार किया,
त्याग तेरा हुआ जग–विशेष।

हे राम! तेरा हर आचरण,
भक्तों को राह दिखाता है,
तेरा हर वचन करुणामय,
मानव को धर्म सिखाता है।

रावण भी तेरे सम्मुख आया,
पर तूने उसे अवसर दिया,
हे दयालु! तूने शत्रु को भी,
पाप छोड़ने का अवसर दिया।

तेरे नाम से आँसू बदलते,
गंगाजल बन जाते हैं,
तेरे स्मरण से पाप सभी,
क्षण में धुल जाते हैं।

भक्तों की पुकार सुनने वाले,
करुणा का सागर कहलाने वाले,
राम! तेरा नाम जपने से ही,
मन के दुख सब मिट जाने वाले।

हे प्रभु! तेरा आशीष मिले,
तेरे चरणों का प्रेम मिले,
तेरे बिना कुछ भी नहीं,
बस तेरा नाम जीवन तले।

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