ले चलो न फिर वहीं बस तुम और मैं.

ले चलो न फिर वहीं
बस तुम और मैं...
और कुछ नहीं...

ख़ाली रात...
गुमसुम हवाएँ...
निहारते तारों की महफ़िल...

और कुछ ऐसी अनकही
जिसे हम कहना ही नहीं...
अकेली रातें,
भीड़ में बस तुम्हारा साथ हो,
तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में हो...

चाहिए ही इससे ज़्यादा क्या,
मर भी जाऊँ तो क्या गिला,
खुले आसमान के तले
हाथ में तुम्हारा हाथ लिए...

— रूपेश रंजन

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