मैं तो परमपिता के साम्राज्य के अधीन हूँ, उनकी अनंत ज्योति में ही मेरा अस्तित्व पूर्ण है।

मैं तो परमपिता के साम्राज्य के अधीन हूँ,
उनकी अनंत ज्योति में ही मेरा अस्तित्व पूर्ण है।
उनके सम्मुख मैं एक रेत कण भी नहीं,
और वही मेरे भीतर सारा आकाश रचते हैं।

हर दूसरी व्यवस्था में मैं कुछ बन जाता हूँ,
कभी नाम, कभी पद, कभी अहंकार का आभूषण।
मगर जब ब्रह्मांड की विशालता में देखता हूँ,
तो पाता हूँ – मैं तो एक श्वास मात्र हूँ।

जो कुछ भी मेरे पास है,
वह भी उनका ही दिया हुआ प्रसाद है।
मेरा वजूद, मेरी पहचान, मेरी चेतना –
सब उनकी करुणा का प्रस्फुटित उपहार है।

दुनिया के दरबारों में मैं अपने को ढूँढता हूँ,
किन्तु पाता हूँ सिर्फ़ मृगतृष्णा की झिलमिल।
सत्य तो उस मौन गहराई में है,
जहाँ “मैं” मिटकर “वह” हो जाता है।

उनके राज्य में कोई सीमाएँ नहीं,
न पद, न महिमा, न अधिकार।
सिर्फ़ समर्पण का अमृत है,
सिर्फ़ शांति की शीतल छाँव।

जब मैं झुकता हूँ उनके चरणों में,
तो पाता हूँ असली स्वतंत्रता का विस्तार।
क्योंकि समर्पण में ही वह शक्ति है
जो अहंकार के सारे ताले खोल देती है।

वही मेरा राजा, वही मेरा धर्म,
वही मेरा सत्य, वही मेरा कर्म।
उनके आगे मैं शून्य, पर उन्हीं से पूर्ण,
उनके ही साम्राज्य में मुझे अपना घर मिलता है।

मैं जानता हूँ —
यही सच्चा सौदा है इस जीवन का,
यही ज्ञान का परम अनुभव है।
अहं को त्यागना, ईश्वर को अंगीकार करना,
और ब्रह्मांड की विशालता में
स्वयं को विलीन कर देना।

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