जब गठबंधन छीन लेते हैं वोटरों की आज़ादी — बिहार की लोकतांत्रिक उलझन



🗳️ जब गठबंधन छीन लेते हैं वोटरों की आज़ादी — बिहार की लोकतांत्रिक उलझन

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सबसे बड़ी ताक़त जनता के पास होती है — उसका वोट।
लेकिन जब यही वोट किसी राजनीतिक समीकरण या गठबंधन के कारण मजबूरी बन जाए, तब लोकतंत्र की असली आत्मा पर सवाल खड़े हो जाते हैं।

बिहार आज ऐसी ही स्थिति से गुज़र रहा है — जहाँ गठबंधन की राजनीति ने जनता की असली पसंद को कमज़ोर कर दिया है।


वोटर की दुविधा: जब वोट देना मजबूरी बन जाए

एक आम बिहारी मतदाता की स्थिति सोचिए।
उसे भाजपा की राष्ट्रीय नीतियाँ पसंद हैं, लेकिन जेडीयू (JDU) के प्रदेश शासन से वह नाराज़ है।
फिर भी, जब दोनों साथ हैं, तो बीजेपी को वोट देना यानी नीतीश कुमार को भी मज़बूत करना — यानी अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ वोट डालना।

दूसरी तरफ़, कोई मतदाता कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष सोच का समर्थक है, लेकिन राजद (RJD) की भ्रष्टाचार वाली छवि से परेशान है।
फिर भी, जब दोनों एक साथ महागठबंधन में हैं, तो कांग्रेस को वोट देना मतलब लालू परिवार को भी ताक़त देना।

ऐसे में सवाल उठता है —
क्या यह असली लोकतंत्र है, या फिर गठबंधन की मजबूरी में बंधा हुआ वोटर?


बिहार की गठबंधन राजनीति: सिद्धांत नहीं, समीकरण

बिहार में गठबंधन अब कोई नई बात नहीं।
यहाँ हर चुनाव से पहले राजनीतिक दलों की जोड़-तोड़, बिछड़ना और फिर से मिलना आम बात हो गई है।

  • भाजपा–जेडीयू गठबंधन:
    कभी कट्टर विरोधी रहे नीतीश कुमार और बीजेपी आज फिर एक साथ हैं।
    2013 में जब नीतीश ने नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा से रिश्ता तोड़ा था, तब उनके समर्थक मान गए थे कि यह सिद्धांत की राजनीति है।
    लेकिन कुछ साल बाद वही नीतीश फिर बीजेपी के साथ आ गए — सत्ता में बने रहने के लिए।
    अब जो मतदाता भाजपा को पसंद करता है लेकिन नीतीश से नाराज़ है, उसके पास कोई साफ़ विकल्प नहीं बचता।

  • राजद–कांग्रेस महागठबंधन:
    दूसरे छोर पर लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद और कांग्रेस का गठबंधन है।
    कांग्रेस का एक तबका जो साफ़-सुथरी राजनीति और विकास की बात करता है, उसे राजद के साथ खड़ा देखना कठिन लगता है।
    लेकिन बिहार की राजनीति में “भाजपा को रोकने” के नाम पर यह गठबंधन हर चुनाव में मजबूती पाता है।
    पर यहाँ भी जनता के पास सीमित विकल्प रह जाते हैं —
    या तो राजद के साथ कांग्रेस को वोट दो, या फिर भाजपा–जेडीयू को।

  • लोजपा (LJP) की टूट और भ्रम:
    रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा भी एक समय बिहार की राजनीति में तीसरा विकल्प बन सकती थी।
    लेकिन उनके निधन के बाद पार्टी दो हिस्सों में बँट गई —
    एक चिराग पासवान के नेतृत्व में, जो भाजपा से सहानुभूति रखता है, और दूसरा पारस गुट, जो सीधे भाजपा के साथ है।
    अब जो मतदाता पासवान परिवार की विचारधारा का समर्थक है, उसे यह समझना मुश्किल है कि वह किसे वोट दे — चिराग को या पारस को?


राजनीति अब “किसके खिलाफ” की नहीं, “किसके साथ” की बन गई है

बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा संकट यही है कि पार्टियाँ अब “जनता के मुद्दों” पर नहीं, बल्कि “किसे हराना है” इस सोच पर चुनाव लड़ती हैं।
महागठबंधन की एकजुटता भाजपा को हराने के लिए है, और एनडीए की एकजुटता राजद को रोकने के लिए।

इस बीच असली मुद्दे —
रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, और सुशासन —
सिर्फ भाषणों तक सीमित रह जाते हैं।

गठबंधन बनने के बाद न तो विचार बचता है, न ही वैचारिक स्पष्टता।
हर दल अपने-अपने वोट बैंक और जातीय गणित के हिसाब से तालमेल करता है।
जनता की सोच, उसकी आकांक्षा — सब राजनीतिक गणनाओं में गुम हो जाती है।


जब जवाबदेही खत्म हो जाती है

गठबंधन राजनीति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जवाबदेही (Accountability) धुंधली हो जाती है।
अगर बिहार सरकार में कोई नाकामी होती है, तो दोष किसका है — जेडीयू का या भाजपा का?
अगर राजद के किसी नेता पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, तो कांग्रेस क्या बोलेगी — विरोध करेगी या गठबंधन के नाम पर चुप रहेगी?

इस तरह गठबंधन में सब मिलकर सत्ता बाँट लेते हैं, लेकिन जवाबदेही कोई नहीं लेता।


मतदाता की बेबसी और मौन विरोध

आज बिहार के गाँव–कस्बों में आम मतदाता यही कहता सुना जाता है —

“मैं जेडीयू को वोट नहीं देना चाहता, पर क्या करूँ, वो भाजपा के साथ है।”
“मुझे कांग्रेस पसंद है, लेकिन राजद के साथ देखकर मन खट्टा हो जाता है।”

यह वो मौन विरोध है जो चुनाव नतीजों में तो नहीं दिखता,
लेकिन लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर देता है।


अब वक्त है — असली लोकतंत्र को वापस लाने का

गठबंधन राजनीति कोई गलत चीज़ नहीं — अगर वह सिद्धांतों और नीतियों पर आधारित हो।
लेकिन बिहार में यह ज़्यादातर “सत्ता बचाने” या “विपक्ष को हराने” के लिए की जाती है।

राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे अपने बल पर जनता के बीच जाएँ,
अपना साफ़ एजेंडा रखें, और जवाबदेही तय करें

अगर गठबंधन करना ही है, तो वह पारदर्शी हो,
और जनता को साफ़ बताया जाए कि दोनों दलों की भूमिकाएँ क्या होंगी।


निष्कर्ष: लोकतंत्र में विकल्प का अधिकार सबसे बड़ा अधिकार है

लोकतंत्र तभी जीवित रहेगा जब जनता के पास विकल्प रहेगा।
बिहार के मतदाता आज यही कह रहे हैं —
“हमें किसी पार्टी को उसकी साख और काम के आधार पर चुनने दो, न कि उसके गठबंधन के आधार पर।”

जब वोट “पसंद” से नहीं बल्कि “मजबूरी” से डाला जाता है,
तो वह लोकतंत्र नहीं, राजनीतिक सौदा बन जाता है।

बिहार, जिसने कभी राजनीति की दिशा बदली थी,
अब फिर से एक नई मिसाल कायम कर सकता है —
अगर जनता खुले दिल से कहे:

“हमें गठबंधन नहीं, साफ़ विकल्प चाहिए।”

क्योंकि लोकतंत्र की असली ताक़त वही है — स्वतंत्र सोच और स्वतंत्र वोट।



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