मेरे पास बीज हैं, पर मैं ज़िंदगी नहीं दे सकता।
मैं दूसरे के खेत में पौधा नहीं रोप सकता,
मैं दूसरे के खेत में बिना पूछे पानी नहीं पटा सकता,
मैं दूसरे के खेत से मिट्टी लेकर गमले में पौधा नहीं रोप सकता।
मेरे पास बीज हैं,
पर मैं ज़िंदगी नहीं दे सकता।
मुझे पौधे रोपने हैं,
उन्हें पानी देना है,
उनकी सेवा करनी है,
उन्हें बड़ा होते देखना है।
इसके लिए मुझे खेत चाहिए,
गमला चाहिए,
मिट्टी चाहिए,
खाद चाहिए।
पर मैं ग़रीब हूँ,
मैं कुछ नहीं खरीद सकता।
मुझे दूसरों के खेत में मज़दूरी करनी होगी,
वहाँ शायद थोड़े पैसे मिलेंगे।
और वहाँ मैं पौधों की सेवा भी कर पाऊँगा।
मैं अभी कुछ करता हूँ,
थोड़े बहुत पैसे मिलते हैं,
पर इतने नहीं कि खेत खरीद सकूँ।
और अगर दूसरों की ज़मीन पर काम करूँ,
तो घर चलाना मुश्किल हो जाएगा।
इसी दुविधा में हूँ—
बीज मेरे पास हैं,
पर ज़मीन नहीं।
सपना मेरे भीतर है,
पर साधन नहीं।
मन में हरियाली है,
पर हाथों में बस सूखी मिट्टी। 🌱
रूपेश रंजन
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