कोई ख़ास वजह भी तो नहीं।

मुल्क ही तो है तुम्हारा,
कोई दुश्मन तो नहीं,
क्यों ही लड़ रहे हो तुम,
कोई ख़ास वजह भी तो नहीं।

माना होता कि मुल्क ने दगा दिया हो तुझे,
तेरी हसरतों को ठुकराया हो,
तुझे बेचैन-ए-आलम-सा बना रखा हो,
ऐसी कोई वजह दिखती तो नहीं।

ये तो मेरी बात है,
बस कहने के लिए,
कौन घर छोड़ के जाता है अपनों से दुखी होकर,
घर है अपना — तो पराया है कौन यहाँ?
किससे लड़ना है तुझे?

मेरी तो समझ नहीं आती,
ऐसा भी क्या मुंह फुलाना,
जला के अपने मुल्क को
कोई रोशन नहीं करता अपने घर को।

बर्बाद कर दो गुलशन को
अगर तुम्हें ख़ुशी मिलती है अगर,
याद रखना —
शाम घर में नहीं,
गुलशन में सजती है... 

रूपेश रंजन

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