"रूप नहीं, हृदय का सौंदर्य"

"रूप नहीं, हृदय का सौंदर्य"

चेहरे की चमक मिट जाती, समय की धूप में जलकर,
पर दिल की रौशनी चमकती, युगों युगों तक पलकर।
रूप तो बस एक आवरण है, क्षणिक मोह का जाल,
सच्ची सुंदरता बसती है, निर्मल मन के ताल।

नयन सुहाने क्या करें, यदि दृष्टि में दया न हो,
शब्द मधुर क्या अर्थ दें, यदि भाव में माया न हो।
सुगंध नहीं फूल की, यदि उसमें करुणा न मिले,
साज नहीं जीवन का, यदि मन में प्रेम न खिले।

रूप का वैभव मुरझाएगा, झुर्रियों में ढल जाएगा,
पर कर्म का सौंदर्य जग में, अमर गीत बन जाएगा।
मृदुता, नम्रता, करुणा, यही हैं सच्चे श्रृंगार,
जो इन्हें धारण कर लेता, वही होता साकार।

निहारो न केवल चेहरा, झाँको मन की गहराई में,
जहाँ बसता है ईश्वर, हर सच्ची परछाई में।
रूप नहीं, हृदय का सौंदर्य, सबसे सुंदर राग,
जो सुन ले उस संगीत को, मिट जाए हर दाग।

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