एक लड़की थी… दर्द की दास्तान

एक लड़की थी…
दर्द की दास्तान

एक लड़की थी…
जिसकी पलकों पर बचपन ही ठहर गया था,
माँ की ममता की छाँव
उसके पहले खिलने से पहले ही
आसमान में खो गई थी।

माँ गई…
और घर का आँगन सूनेपन से भर गया।
फिर पिता ने साँसों की थकान मिटाने
नई डोरी बाँध ली…
पर उस डोरी में
उसके लिए कोई जगह न थी।

बाप भी अपना न रहा—
कहीं भी नहीं, किसी भी मोड़ पर नहीं।
वो बस एक कोने में खड़ी
अपने हिस्से का प्यार
दीवारों में ढूँढती रह गई।

पर दिल को दिल का रास्ता
फिर भी मिल ही जाता है।
बचपन की गलियों में
एक लड़का था—
जो उसकी हँसी में
अपना कल देखता था।
वो भी उससे बेइंतहा प्यार करता था,
और लड़की भी उससे।

पर किस्मत को
दो प्यारों का मिलना कब मंज़ूर था?
शादी की राहें तो
अक्सर घर के दरवाज़ों से शुरू होकर
समाज के फतवों पर खत्म हो जाती हैं।

लड़की की शादी
बिना उम्र पूछे, बस रिवाज पूछकर कर दी गई।
उसकी हँसी, उसके सपने, उसके अरमान—
सब पर एक मूक पर्दा डाल दिया गया।

फिर एक दिन पिता भी चला गया,
उसकी ज़िंदगी से
आख़िरी सहारा भी टूटकर गिर पड़ा।

वक़्त बीतता रहा,
साल बदलते रहे,
पर दिल पर जमे कुछ नाम
कभी धुँधले नहीं होते।
वो फिर लड़के से बात करने लगी—
वही पुराना प्यार,
वही ठहरी हुई साँसें,
वही अनकही बातें…
पर अब कुछ भी हो नहीं सकता था।
दोनों समझते थे—
दिल टूटने की आवाज़
सबसे ज़्यादा चुपचाप होती है।

फिर एक दिन—
एक आम-सा दिन,
जिसे कोई ख़ास होना नहीं था,
फिर भी वो ज़िंदगी मोड़ ले आया।

लड़की ने काँपती आवाज़ में
फोन मिलाया…
लड़का बोला— "हाँ, कहो?"
उधर से बस एक टूटी हुई साँस आई,
और फिर शब्द—

“मेरे पति का…
एक्सिडेंट में…
देहांत हो गया…”

उसके बाद जो ख़ामोशी गिरी
वो किसी भी चीख़ से गहरी थी।
प्यार, जो कभी मिल नहीं पाया,
अब वापस बुलाने पर भी
लौट नहीं सकता था।

दोनों तरफ आँसू थे—
एक तरफ़ विधवा का दुःख,
दूसरी तरफ़ उस प्रेमी का
जो हमेशा उसे सुरक्षित देखना चाहता था।

ज़िंदगी फिर भी चलती रहेगी—
पर कुछ कहानियाँ
कभी पूरी नहीं होतीं,
कुछ प्यार
कभी मुकम्मल नहीं होते।
कभी-कभी किस्मत
सबसे मासूम दिलों पर
सबसे भारी बोझ रख देती है—
और लोग…
बस जीना सीख लेते हैं
अपने ही टूटे हुए हिस्सों के साथ।

रूपेश रंजन

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