Terrorism Has No Religion...
Terrorism Has No Religion
Terrorism has no religion.
Terrorists are terrorists.
That’s it.
फिर भी, हर हमले के बाद हम एक ही गलती दोहराते हैं—
हम अपराध को आस्था से जोड़ने लगते हैं,
हिंसा को पहचान का नाम दे देते हैं,
और इंसान को भूल जाते हैं।
आतंकवाद किसी धर्म का प्रतिनिधि नहीं होता।
वह न किसी किताब से पैदा होता है,
न किसी प्रार्थना से,
न किसी ईश्वर की इच्छा से।
वह पैदा होता है
नफ़रत से,
अधिकार की भूख से,
और सत्ता की विकृत चाह से।
हर धर्म—चाहे वह किसी भी कोने में जन्मा हो—
जीवन की बात करता है,
करुणा की बात करता है,
संयम और सह-अस्तित्व की बात करता है।
आतंकवाद इन सबका ठीक उल्टा है।
जब एक आतंकी हमला होता है,
तो मरने वाला
किसी धर्म का नहीं होता—
वह सिर्फ़ इंसान होता है।
उसकी आख़िरी साँस
यह नहीं पूछती
कि तुम किसे मानते हो,
वह सिर्फ़ यह पूछती है—
क्या मैं सुरक्षित हूँ?
Bondi Beach जैसी जगहें
खुशी, आज़ादी और जीवन का प्रतीक हैं।
ऐसी जगहों पर हिंसा
सिर्फ़ शरीरों पर नहीं,
हमारी सामूहिक इंसानियत पर हमला होती है।
लेकिन आतंकवाद का सबसे बड़ा हथियार
बम या बंदूक नहीं होता—
वह हमारा डर होता है।
और उसका सबसे बड़ा साथी
हमारी जल्दबाज़ी में बनाई गई धारणाएँ होती हैं।
जब हम किसी पूरे समुदाय को
एक अपराध के लिए दोषी ठहराते हैं,
तो हम वही काम कर रहे होते हैं
जो आतंकी चाहता है—
विभाजन।
याद रखना ज़रूरी है:
आतंकी अकेला होता है,
वह किसी का प्रतिनिधि नहीं होता।
वह न धर्म बोलता है,
न संस्कृति,
न देश।
वह सिर्फ़ हिंसा बोलता है।
अगर हमें सच में
आतंकवाद के ख़िलाफ़ खड़ा होना है,
तो हमें
नफ़रत की भाषा छोड़नी होगी,
और इंसानियत की भाषा अपनानी होगी।
क्योंकि अंत में
धर्म नहीं मारता,
आदमी मारता है।
और आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता।
Terrorism has no religion.
Terrorists are terrorists.
That’s it.
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