ज़िंदगी थोड़े खत्म हो जाएगी।
कितना ही रोऊँ,
कितना ही हँसू,
ज़िंदगी थोड़े खत्म हो जाएगी।
कमबख़्त—
रोने पे निकल जाती जान,
हँसने पे भी निकल जाती जान।
सब पड़ाव है,
मंज़िल नहीं।
ज़िंदगी तो जीनी ही पड़ेगी,
चाहे कितनी भी मुश्किल हो रास्ते में।
तो जियो न—
क्यों ही शिकवा-शिकायत?
ना मिल पाया कोई साथी,
तो कोई ग़म नहीं।
नदियों और पहाड़ों का कहाँ कोई अपना हुआ है?
भरे खेत और बिन फ़सल के खेत—
मैंने देखा है,
खेत मर नहीं जाते…
रूपेश रंजन
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