तुम्हें नींद कैसे आ जाती है...

तुम्हें नींद कैसे आ जाती है
मुझे तो सवाल ओढ़ते ही
नींद मुँह मोड़ लेती है

तुम शायद
सोच को थकने नहीं देते
या फिर
सोचना ही छोड़ दिया है
इसलिए

किसी का घर तोड़ दिया
और कहा—
“यह तो हमारा ही था”
करोड़ों सालों से
तुम जानते थे
यह झूठ नहीं
सुविधा की भाषा है

मुझे पता है
हर चीज़ का अंत है
हर देह, हर दीवार, हर व्यवस्था
एक दिन मिटेगी
तुम भी
मैं भी

पर मैं
अपने कंधों पर
इतिहास का अपराध
क्यों लादूँ?


सब कुछ
एक दिन खत्म होता है
सब कुछ
एक दिन बदलता है
विनाश के बाद ही
सृजन का जन्म होता है
चाहे मैं चाहूँ
या न चाहूँ

लेकिन इस बार
मध्यम नहीं
मुख्य कारण
तुम ही बनोगे

हम कभी चीज़ें बचाते हैं
परंपरा के नाम पर
कभी संस्कृति के नाम पर
कभी पुरखों की धरोहर कहकर
कभी इतिहास कहकर
तो कभी
अपनी पहचान कहकर

यह सच है
इनके नष्ट हो जाने से
हम तुरंत मर नहीं जाते
पर यह भी सच है
कि सदियों से
हम
अपनी पहचान को
बचाते-बचाते
खुद को
थोड़ा-थोड़ा
खोते आए हैं

कोई नहीं
पुराना मकान टूटेगा
धूल बनेगा
याद बनेगा
और उसी मलबे पर
एक नया मकान खड़ा होगा
जिसकी दीवारों में
शायद
थोड़ी-सी
जवाबदेही भी होगी
और
थोड़ी-सी
नींद उड़ाने वाली
सचाई भी

रूपेश रंजन

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