किसी ने शायद गलत किया होगा...
किसी ने
शायद
गलत किया होगा
तभी तो
उसका घर
तोड़ा जा रहा है
तभी तो
बुलडोज़र
चल रहा है
यही कहा जाता है
यही सुनाया जाता है
मलबे की आवाज़ में
सवाल दब जाते हैं
सरकार
सबसे बड़ी हो गई है
भगवान
छोटे पड़ गए
राजनीति
सब कुछ तय करती है
धर्म
सिर्फ नारे में बचा है
न्याय
फाइलों में सोता है
सच
भीड़ से डरता है
और डर
कानून से पहले
दिलों में उतर आता है
पता नहीं
क्या सही है
क्या गलत
कौन अपराधी है
और कौन सिर्फ
कमज़ोर
घर
ईंटों से नहीं
यादों से बनता है
माँ की रसोई
बच्चे की हँसी
बुज़ुर्ग की दहलीज़
सब कुछ
एक झटके में
अवैध हो जाता है
बुलडोज़र
जब चलता है
तो सिर्फ दीवारें नहीं
संवेदनाएँ भी
रौंद देता है
शायद
किसी ने
गलत किया होगा
या शायद
गलत सिर्फ
इतना था
कि वह
सबसे शक्तिशाली नहीं था
आज
फैसले
शोर से होते हैं
और
सच
खामोशी में
टूटता है
पता नहीं
क्या सही
क्या गलत
इतिहास
शायद बाद में बताए
अभी तो
मलबे में
इंसान
खड़ा है
और
सत्ता
आगे बढ़ चुकी है
रूपेश रंजन...
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