गांधी तो रोज़ ही मरता है इस देश में…

गांधी तो रोज़ ही मरता है इस देश में…

गांधी तो रोज़ ही मरता है इस देश में,
कभी भूख की कतार में,
कभी भीड़ के नारे में,
कभी मौन पड़े क़ानून के चेहरे में।

गोली अब ज़रूरी नहीं रही,
सच को मारने के लिए—
यहाँ तालियाँ काफ़ी हैं
झूठ को ज़िंदा रखने के लिए।

कितनों को गोडसे ठहराओगे?
जब हर गली में नफ़रत तैनात है,
जब हर सवाल देशद्रोह है,
और हर चुप्पी राष्ट्रभक्ति की औलाद है।

यहाँ चरखा नहीं घूमता—
यहाँ अफ़वाहें चलती हैं,
यहाँ राम का नाम लेकर
सीताएँ रोज़ जलाई जाती हैं।

गांधी मरता है जब
संविधान किताब बनकर रह जाता है,
जब सत्ता की भाषा में
न्याय सिर्फ़ एक बहाना बन जाता है।

गांधी मरता है तब भी,
जब हम कहते हैं— “क्या फ़र्क़ पड़ता है?”
यही वाक्य सबसे बड़ी गोली है,
जो सबसे पहले विवेक को लगती है।

पर सुनो—
गोडसे इतिहास की गलियों में सड़ते हैं,
और गांधी हर उस इंसान में साँस लेता है
जो डर के बावजूद सच बोलने की हिम्मत रखता है।

इसलिए पूछो अपने आप से—
गांधी को मारने वालों की गिनती नहीं,
गांधी को बचाने वालों में
आज हम खड़े हैं या नहीं?

रूपेश रंजन

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