रुकूँ या बढ़ जाऊँ....

रुकूँ या बढ़ जाऊँ.... 


रुकूँ या बढ़ जाऊँ—
यह प्रश्न नहीं,
यह मेरे भीतर चलती
एक थकी हुई यात्रा है।

कभी सोचा था, रुक जाऊँ,
पलभर को ही सही—
ताकि साँसें
अपने ही भार को पहचान सकें।
पर वह बढ़ गया,
बिना पीछे देखे,
जैसे समय
कभी किसी का इंतज़ार नहीं करता।

अब कभी सोचता हूँ,
मैं भी बढ़ जाऊँ—
अपने संकोच,
अपने डर से आगे।
पर मन का एक कोना
आज भी ठिठक कर पूछता है—
कहीं वह रुका हो?
कहीं उसी मोड़ पर,
जहाँ से हम दोनों
एक ही दिशा में चले थे।

रुकना भी एक साहस है,
और बढ़ना भी—
रुकना स्मृतियों के साथ जीना,
बढ़ना संभावनाओं को चुनना।
मैं दोनों के बीच खड़ा हूँ,
एक अधूरी पगडंडी पर,
जहाँ हर कदम
खुद से ही सलाह माँगता है।

यदि वह रुका है,
तो शायद प्रतीक्षा अर्थ पाए।
यदि वह बढ़ गया है,
तो आगे बढ़ना ही
मेरी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
इसलिए आज मैं
न पूरी तरह रुकता हूँ,
न अंधाधुंध बढ़ता हूँ—
बस इतना करता हूँ
कि अपने कदम को
ईमानदार रखता हूँ।

रूपेश रंजन

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