मैं लिखता ही हूँ भूलने के लिए...

मुझसे मत पूछो
मैंने क्या क्या लिखा है
मैं लिखता ही हूँ भूलने के लिए

माफ कर दो मुझे
मैं सुना नहीं सकता अपना दर्द
दर्द की नुमाइश होगी
और मेरा दर्द ही मेरी मोहब्बत है

वो नहीं कहीं है
सिवाय मेरे अंदर
मैं जी रहा हूँ उसके साथ
तुम देख सकते हो मेरी किताबों में

रौशनी जैसी है वह
मेरी अंधेरी दुनिया में
मैं देख पाता नहीं उसे
रौशनी कुछ ज्यादा है इसलिए

खुद को झूठ बोलती है
या दुनिया से छुपाती है
सूरज को भी पता होता है
कौन ही देख सकता है उसकी तरफ

रूपेश रंजन

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