तेरी महक

तेरी महक

कितने फूल देखे मैंने
रंगों से लदे, रूप से सजे,
किसी में सावन की भीनी धूप,
किसी में फागुन की हल्की नशा।

किसी की पंखुड़ियों पर
ओस मोती-सी ठहरी थी,
किसी की मुस्कान में
भोर की उजली लाली थी।

पर जब भी हवा चली,
उनकी खुशबू क्षण भर ठहरी—
जैसे कोई वादा अधूरा,
जैसे कोई गीत बिन स्वर।

तेरे जैसा कोई
महका ही नहीं कभी।
तेरी सुगंध तो
रूह की तहों में उतरती है,
जहाँ शब्द नहीं पहुँचते,
वहाँ भी तू गूँजती है।

तू फूल नहीं,
एक एहसास है—
जो मौसमों का मोहताज नहीं,
जो दूरी से फीका नहीं पड़ता।

कितने फूल देखे मैंने,
हर बगिया में, हर डाली पर—
पर तेरी-सी महक
किसी में ठहरी ही नहीं।

तू महक नहीं,
मेरे अस्तित्व की पहचान है।

रूपेश रंजन

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