मौत ए फ़रमाइश है मेरी...
मौत ए फ़रमाइश है मेरी,
ज़िंदगी से कोई ख़ास मोहब्बत नहीं,
थक गया हूँ इन राहों से मैं,
अब कोई नई राहत नहीं।
ख्वाब जो देखे थे कभी,
अब धुंधले से लगते हैं,
जिन रास्तों पर चला था हँसकर,
वहीं कदम अब रुकते हैं।
भीड़ में भी तन्हा हूँ मैं,
अपनों में भी अजनबी सा,
हर चेहरा कुछ कहता है,
पर दिल रहे खामोशी सा।
दे सकते हो तो आज़ादी दो,
इन जंजीरों से, इन साँसों से,
वरना इस बोझिल जीवन को,
छुड़ा दो अपनी बाहों से।
न कोई शिकवा, न कोई गिला,
बस एक सुकून की चाह है,
जो मिल जाए एक पल को भी,
तो वही मेरी पनाह हैं।
अगर मौत ही मंज़िल है,
तो डर कैसा उस सफ़र से,
जब जीना ही कैद लगे,
तो क्या डरना इस असर से।
मौत ए फ़रमाइश है मेरी,
ये आख़िरी अर्ज़ी समझो,
या दे दो जीने की वजह,
या फिर ख़ामोशी को ही मंज़ूर समझो।
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