मौत की फ़रमाइश है लबों पर...

मौत की फ़रमाइश है लबों पर, पर दिल अब भी खामोश नहीं,
ज़िंदगी से शिकवा तो है मगर, उससे पूरी बेरुख़ी भी नहीं।

क़ैद-ए-हयात से थक चुका हूँ, ये साँसें बोझ सी लगती हैं,
दे दो अगर आज़ादी तो बेहतर, वरना ये धड़कनें भी सज़ा सी लगती हैं।

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