मुलाक़ात की बारी

मुलाक़ात की बारी

मुझे लगता था—
कौन तड़पेगा एक मुलाक़ात के लिए,
कौन थामेगा साँसों की डोरी
उस एक क्षण की प्रतीक्षा में।
पर समय ने मुस्कुराकर कहा—
अब तेरी बारी आई है।

धूप-धुएँ से भरे उस मंदिर में
मैंने अपने ही भीतर की सीढ़ियाँ उतर लीं,
एक हाथ आकाश को अर्पित,
दूसरा धरती की नब्ज़ पर टिका—
जैसे प्रार्थना और प्रतिरोध
एक ही देह में साथ जन्मे हों।

दीवारों पर शिव की मौन दृष्टि थी,
और मेरे कंठ में अटकी अनगिनत पुकारें,
रुद्राक्ष की हर माला
मेरी धड़कनों को गिनती रही—
तप ही तो है प्रेम का दूसरा नाम,
और प्रतीक्षा उसका दीर्घ व्रत।

मैंने सोचा था—
विरह केवल कथाओं में होता है,
पर जब भीतर अग्नि जले
तो देह भी दीपक बन जाती है।
आँखों में धुँआ, होंठों पर नाम,
और समय—जैसे स्थिर जल।

अब समझी हूँ—
मुलाक़ात केवल किसी और से नहीं होती,
कभी-कभी वह अपने ही सत्य से होती है।
तड़प का अर्थ हार नहीं,
वह तो आत्मा का आरोह है—
जहाँ प्रेम, भक्ति बनकर
स्वयं से मिलाता है।

मुझे लगता था—
कौन तड़पेगा एक मुलाक़ात के लिए…
फिर मेरी बारी आई,
और मैंने जाना—
सबसे कठिन, सबसे पवित्र
मुलाक़ात अपने भीतर के ईश्वर से होती है।

रूपेश रंजन

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