अंतिम आलिंगन
अंतिम आलिंगन
मैंने कई चेहरों को
बिना कारण खो दिया था—
जैसे हवा अचानक दिशा बदल ले
और पत्ते समझ न पाएँ
किस ओर गिरना है।
कुछ लोग जीवन से
यूँ ही चुपचाप चले जाते हैं,
बिना आहट, बिना स्पष्टीकरण,
पीछे छोड़ जाते हैं
अनगिनत प्रश्नों की धूल।
फिर समझ आया—
वियोग अकस्मात नहीं होता,
हम ही टालते रहते हैं
वह एक अंतिम क्षण
जिसमें सब कहा जा सकता था।
जब तुम गए
और शब्द मेरे पास ही रह गए,
तब जाना—
हर विदा से पहले
एक आलिंगन अनिवार्य होता है।
एक ऐसा आलिंगन
जो शिकायतों को क्षमा में बदल दे,
जो मौन को स्वीकार में ढाल दे,
जो अधूरे वाक्यों को
पूर्ण विराम दे सके।
अब यदि कोई जाता है,
मैं उसे रोकता नहीं—
बस इतना करता हूँ
कि उसके कंधे पर
अपना स्नेह रख दूँ।
क्योंकि कौन जानता है
कौन-सी मुलाकात
अंतिम सिद्ध हो जाए—
और कौन-सा स्पर्श
स्मृति का शाश्वत आधार बन जाए।
रूपेश रंजन
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