मैं बहुत आगे आ चुका हूँ....

मैं बहुत आगे आ चुका हूँ,
रास्तों की धूल अब पहचान बन गई है,
पीछे मुड़ने की आदत छूट गई,
कदमों में अब बस आगे की थकान बस गई है।

कई मोड़ आए थे सफ़र में,
हर मोड़ पर एक कहानी ठहरी थी,
कुछ हँसी की परछाइयाँ थीं,
कुछ आँखों में चुपचाप नमी गहरी थी।

किस-किस मोड़ पर लौटूँ भला,
हर एक से जुड़ी सौगातें हैं,
कुछ अधूरी सी बातें हैं,
कुछ खामोश सी मुलाकातें हैं।

इसलिए बेहतर है चलता रहूँ,
समय की धारा में बहता रहूँ,
जो बीत गया उसे सलाम करूँ,
और आने वाले कल से कहता रहूँ।

पर तुम अगर एक बार पुकार लो,
नाम मेरा हवा में उछाल दो,
मैं समय की दीवारें लाँघ कर,
हर दूरी का हिसाब टाल दूँ।

मैं लौट आऊँगा उस मोड़ पर,
जहाँ पहली बार तुम मिली थीं,
जहाँ धड़कनों ने रुककर कहा था—
यही राह सबसे सजीली थी।

फिर न आगे जाने की चाह होगी,
न पीछे छूटने का डर होगा,
बस वही मोड़ मेरी दुनिया होगी,
और वही पल मेरा घर होगा।

रूपेश रंजन

Comments

Popular Posts