मुस्कानों का उजाला
मुस्कानों का उजाला
मैं दुखी रहूँ तो
मेरे पास मत आया करो,
मेरी पलकों पर ठहरे हुए बादल
तुम्हारे आकाश को बोझिल कर देंगे।
मेरे आँसुओं की नमी
तुम्हारी हँसी की धूप को
अनचाहा सावन बना देगी,
और मैं यह अपराध नहीं चाहती।
मैं चाहती हूँ
जब भी मिलूँ तुमसे,
मेरे अधरों पर
प्रभात की किरणें ठहरी हों।
तुम्हारी राहों में
मैं दीप-सी जलूँ,
तुम्हारे थके क्षणों में
शीतल पवन-सी बहूँ।
दर्द मेरा निजी संध्या है,
उसे मैं स्वयं जी लूँगी—
पर तुम्हारे हिस्से में
केवल उजास ही आने दूँगी।
यदि कभी आँखों में नमी दिखे भी,
समझ लेना—
वह भी किसी मुस्कान की
जन्मभूमि है।
रूपेश रंजन
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