इंतज़ार
इंतज़ार
प्रेमियों के हिस्से
पूर्ण रातें कहाँ आती हैं—
उनके पास तो बस
रात के शेष अंश ठहरते हैं,
थोड़ी-सी चाँदनी,
थोड़ी-सी नमी,
और बहुत सारा मौन।
उनकी आँखें
सिर्फ देखने का माध्यम नहीं होतीं,
वे संग्रहालय होती हैं—
जहाँ सुरक्षित रखे जाते हैं
अधूरे स्पर्श,
अनकहे वाक्य,
और मिलने की अधीर तिथियाँ।
हर पलक झपकने के साथ
एक स्मृति सँभलती है,
हर आह के साथ
एक स्वप्न दर्ज होता है।
इंतज़ार
उनके लिए दंड नहीं,
एक साधना है—
जिसमें समय को
धीरे-धीरे पिघलाना पड़ता है।
वे जानते हैं
मिलन क्षणिक है,
पर प्रतीक्षा अनंत—
और इसी अनंत में
प्रेम अपनी गहराई पाता है।
जब अंततः भोर होती है,
तो आँखों में बची रह जाती है
वही उजली रेखा—
जो कहती है,
इंतज़ार व्यर्थ नहीं था।
रूपेश रंजन
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