रेखाओं के पार
रेखाओं के पार
हम सब
किसी न किसी रेखा के भीतर खड़े हैं—
खिंची हुई अदृश्य सीमाएँ
जो मिट्टी पर नहीं,
मन पर उकेरी जाती हैं।
तालाब की मछलियाँ
जल की परिधि में ही साँस लेती हैं,
आकाश उनके लिए
सिर्फ एक चमकता भ्रम है।
घर की चौखट भी
कभी-कभी सीमा बन जाती है,
जहाँ कदमों से पहले
संकोच बाहर निकलता है।
कुछ रेखाएँ परंपरा हैं,
कुछ भय की उपज,
कुछ अहंकार की दीवारें,
और कुछ प्रेम की झिझक।
उन्हें लाँघना सरल नहीं—
क्योंकि हर सीमा के उस पार
या तो संघर्ष खड़ा होता है
या एकाकीपन का वन।
फिर भी इतिहास गवाह है,
हर परिवर्तन की शुरुआत
किसी एक साहसी कदम से हुई है।
रेखाएँ स्थायी नहीं होतीं,
वे समय के साथ धुँधली पड़ती हैं;
बस आवश्यकता होती है
विश्वास की उँगली से
उन्हें हल्का-सा छू देने की।
शायद एक दिन
हम अपने भीतर की सीमाएँ मिटाकर
इतना विस्तृत हो जाएँ
कि कोई रेखा हमें बाँध न सके—
और आकाश
सिर्फ मछलियों का स्वप्न न रहे।
रूपेश रंजन
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