सब चले गए...

सब चले गए,
मैं रह गया—
खाली कमरों की गूँज में
अपनी ही आवाज़ सुनता रह गया।

पहले से बेहतर हूँ शायद,
पहले से ज़्यादा मज़बूत,
टूट कर जो जुड़ा हूँ मैं,
अब पहले से कहीं ज़्यादा पूरा हूँ।

जिन्हें जाना था, वे गए,
रुकना किसी की फ़ितरत न थी,
हर चेहरा एक मौसम था,
हर रिश्ता बस एक दस्तक थी।

कुछ ने हाथ छुड़ा लिया,
कुछ वक़्त की धूल में खो गए,
कुछ सपनों की नाव में बैठकर
दूर क्षितिज की ओर हो गए।

नया क्या है इसमें भला?
आना-जाना तो नियम पुराना है,
हर कहानी का एक विराम है,
हर ठहराव को फिर से जाना है।

तो मैं क्यों सोचूँ ज़्यादा?
क्यों दिल को फिर समझाऊँ?
जिन्हें जाना ही था एक दिन,
उन्हें मुस्कुरा कर विदा कर आऊँ।

सब चले गए—
पर मैं रह गया,
अपने होने की रोशनी में
खुद से फिर से मिल गया।

रूपेश रंजन

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