अधूरी बाँहें

अधूरी बाँहें

मिलन की उस क्षीण रोशनी में
मन ने तुम्हें छू लेने का स्वप्न बुना था,
पर परिस्थितियों की संकोची दीवारों ने
बस दृष्टि की दूरी भर रहने दिया।

शाम धुएँ-सी उतर आई थी,
और आकाश ने केसरिया मौन ओढ़ रखा था।
पटरियों पर ठहरा हुआ समय
जैसे हमारे हृदय की गति गिन रहा था।

भीड़ बहती रही अपने-अपने गंतव्य की ओर,
पर हम वहीं ठहरे रहे—
दो धड़कनों के बीच
एक अनकहा संवाद लिए।

तुम्हारी आँखों में
विरह की नम आभा थी,
और मेरी मुस्कान में
संयम का टूटा हुआ साहस।

छू सकते थे एक-दूसरे को,
पर मर्यादाओं ने बाँहें बाँध दीं।
कह सकते थे बहुत कुछ,
पर शब्दों ने स्वयं को मौन कर लिया।

उस अल्प क्षण में ही
एक युग की गहराई थी—
जहाँ मिलन अधूरा सही,
पर स्मृति पूर्ण हो गई।

शायद अगली बार
समय उदार होगा,
और यह अधूरापन
पूर्ण आलिंगन में बदल जाएगा।

रूपेश रंजन

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