सिर्फ उजाला
सिर्फ उजाला
जब मन पर धूप कम पड़े,
और भीतर संध्या उतर आए,
तब मेरे पास मत ठहरना—
मैं नहीं चाहती
मेरी चुप्पियों का साया
तुम्हारे मन पर गिर जाए।
मेरे आँसुओं का भार
कोई हल्की वस्तु नहीं होता,
वह स्मृतियों की भीगी गठरी है
जिसे मैं स्वयं उठाना जानती हूँ।
तुम आओ तो ऐसे आओ
जैसे सुबह खिड़की पर दस्तक देती है,
और मैं मिलूँ तो ऐसे मिलूँ
जैसे आँगन में पहली किरण उतरती है।
मैं तुम्हें अपने अँधेरों का परिचय नहीं,
अपनी मुस्कानों का उत्सव देना चाहती हूँ।
तुम्हारे जीवन में
मैं कारण बनूँ प्रकाश का,
न कि एक और उदासी का अध्याय।
यदि कभी मेरी आँखें भीगें भी,
तो समझ लेना—
वह वर्षा नहीं,
किसी नई हँसी की तैयारी है।
रूपेश रंजन
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