हवा बन जाने की इच्छा
हवा बन जाने की इच्छा
— रूपेश रंजन
आज मन बहुत बेचैन है,
जैसे कोई अनकही पुकार
अंतर के किसी कोने से
धीरे-धीरे मुझे बुला रही हो।
बहुत मन कर रहा है आज
उसके पास से गुजरने का,
उसकी चुप्पी में छिपे
अर्थों को सुनने का।
ऐ खुदा,
बस इतनी कृपा कर दे
कि कुछ क्षणों के लिए
मुझे हवा बना दे।
मैं छू लूँ उसे
बिना किसी आहट के,
उसके केशों में उलझकर
कुछ पल ठहर जाऊँ।
उसकी पलकों पर बैठकर
थोड़ी ठंडक बन जाऊँ,
उसकी थकी साँसों में
एक हल्की सी राहत भर दूँ।
वह शायद जान भी न पाए
कि कोई उसके पास आया था,
कोई चुपके से
उसके चारों ओर मुस्कुराया था।
मैं बस हवा की तरह
उसके पास से गुजर जाऊँ,
और उसकी दुनिया में
एक क्षण की शांति छोड़ जाऊँ।
क्योंकि कुछ प्रेम
कहने के लिए नहीं होते,
वे बस हवा बनकर
किसी के जीवन को
हल्का-सा छू जाते हैं।
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