राजनीति ही कारण है, राजनीति ही समाधान है

राजनीति ही कारण है, राजनीति ही समाधान है

राजनीति को अक्सर विरोधाभासों के रूप में देखा जाता है। एक ओर इसे विभाजन, संघर्ष, भ्रष्टाचार और अस्थिरता के लिए दोषी ठहराया जाता है, तो दूसरी ओर यही राजनीति व्यवस्था, न्याय और शांति स्थापित करने का माध्यम भी बनती है। यह द्वंद्व ही राजनीति को एक साधारण प्रक्रिया नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाली एक शक्तिशाली व्यवस्था बनाता है। इसलिए यह कहना कि “राजनीति ही कारण है, राजनीति ही समाधान है” कोई विरोधाभास नहीं, बल्कि एक गहरी सच्चाई है।

राजनीति का मूल उद्देश्य समाज का संगठन करना है—संसाधनों का वितरण, कानूनों का निर्माण और सामूहिक निर्णयों का निर्धारण। लेकिन क्योंकि यह शक्ति और पहचान से जुड़ी होती है, इसलिए इसमें विभाजन की संभावना भी निहित रहती है। कई बार नेता और संस्थाएं अपने हितों को साधने के लिए धर्म, जाति, भाषा या विचारधारा के आधार पर लोगों को बांटने लगती हैं। ध्रुवीकरण (polarisation) एक रणनीति बन जाता है। समाज को अलग-अलग खेमों में बांटकर उनके बीच अविश्वास पैदा किया जाता है।
यहीं से राजनीति कारण बनती है।

जो समाज पहले आपसी सौहार्द में जी रहा था, वह अचानक टुकड़ों में बंट जाता है। पड़ोसी एक-दूसरे पर शक करने लगते हैं। भावनाएं भड़कती हैं और तर्क पीछे छूट जाता है। कई बार यही ध्रुवीकरण हिंसा का रूप ले लेता है—दंगे, विरोध, और अराजकता फैल जाती है। यह हिंसा हमेशा लोगों की स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं होती, बल्कि उन्हें उकसाया या प्रभावित किया जाता है। विचारों में लगी आग ही सड़कों पर जलने लगती है।
लेकिन जब यह अराजकता चरम पर पहुंचती है, तो फिर वही राजनीति सामने आती है—स्थिति को संभालने के लिए।

यहीं राजनीति समाधान बनती है।

सरकारें कर्फ्यू लगाती हैं, पुलिस और प्रशासन सक्रिय होता है, नेता शांति की अपील करते हैं। राहत शिविर बनाए जाते हैं, मुआवजा दिया जाता है, शांति समितियां गठित होती हैं और संवाद की प्रक्रिया शुरू होती है। जिन कारणों से संघर्ष पैदा हुआ, उन्हें दूर करने के लिए नीतियां बनाई जाती हैं। इस तरह वही राजनीति, जिसने कहीं न कहीं विभाजन को जन्म दिया था, अब उसे भरने का प्रयास करती है।
यह द्वैत हमें एक असहज सत्य से परिचित कराता है—राजनीति स्वयं में न तो अच्छी होती है, न बुरी। यह मानव के इरादों का प्रतिबिंब होती है। जिस तरह इसका उपयोग विभाजन के लिए किया जा सकता है, उसी तरह इसका उपयोग एकता के लिए भी किया जा सकता है। जो भाषण नफरत फैला सकते हैं, वही भाषण शांति और भाईचारे का संदेश भी दे सकते हैं।

असल प्रश्न यह नहीं है कि राजनीति समस्या है या समाधान।

असल प्रश्न यह है कि हम कैसी राजनीति को चुनते हैं?

जिम्मेदार राजनीति वह है जो समाज को जोड़ती है, न कि तोड़ती है। वह विविधता को कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति मानती है। वह समावेशी विकास, पारदर्शिता और नैतिक नेतृत्व पर जोर देती है। ऐसी राजनीति को अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए संकट पैदा करने की जरूरत नहीं होती, बल्कि वह संकटों को जन्म लेने से पहले ही रोक देती है।

इसके विपरीत, अल्पदृष्टि वाली राजनीति विभाजन पर फलती-फूलती है। वह समाज को एक समग्र इकाई के रूप में नहीं, बल्कि वोट बैंक के रूप में देखती है। वह तात्कालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक शांति को नजरअंदाज करती है। इस प्रक्रिया में वह समस्याएं पैदा करती है और फिर उन्हें हल करने का दावा करती है—एक ऐसा चक्र जो सत्ता को तो लाभ पहुंचाता है, लेकिन समाज को नुकसान।

इस चक्र को तोड़ने के लिए जागरूकता और सहभागिता आवश्यक है। नागरिक केवल दर्शक नहीं हैं, वे राजनीति की नींव हैं। जब लोग जवाबदेही की मांग करते हैं, विभाजनकारी विचारों को अस्वीकार करते हैं और एकता को बढ़ावा देने वाले नेताओं का समर्थन करते हैं, तब राजनीति बदलती है। वह नियंत्रण का माध्यम नहीं, बल्कि प्रगति का साधन बन जाती है।

अंततः राजनीति समाज का दर्पण है। यदि समाज बंटा हुआ है, तो राजनीति भी वैसी ही होगी। यदि समाज एकता, न्याय और समानता की ओर बढ़ता है, तो राजनीति भी उसी दिशा में विकसित होगी। इसलिए शक्ति केवल नेताओं के हाथों में नहीं, बल्कि जनता की चेतना में भी निहित है।

“राजनीति ही कारण है, राजनीति ही समाधान है” केवल एक कथन नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी का संदेश है। यह हमें याद दिलाता है कि राजनीति जहां तूफान खड़ा कर सकती है, वहीं उसे शांत भी कर सकती है। चुनौती यह है कि वह पहले घाव न दे, बल्कि ऐसा समाज बनाए जहां घाव पैदा ही न हों।

क्योंकि सच्ची राजनीति समस्याएं पैदा करके उन्हें हल करने में नहीं, बल्कि ऐसा समाज बनाने में है जहां समस्याएं जन्म ही न लें।


Rupesh Ranjan

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