पत्थरों के बीच बहता सा ये पानी...

पत्थरों के बीच बहता सा ये पानी,
जैसे जीवन की कोई अनकही कहानी।
रास्ते उलझे हों, मंज़िलें दूर सही,
पर ठहर जाना भी तो आसान नहीं।

गलत जगह कैद रहना किसे रास आता है,
दिल तो हमेशा खुला आकाश चाहता है।
भटकना ही सही, पर अपने होने का एहसास हो,
हर मोड़ पर खुद से मिलने का विश्वास हो।

ये चट्टानें भी कहती हैं चुपके से,
मत डर, चल आगे अपने रस्ते पे।
धारा की तरह बह, बंधन तोड़ दे,
जो रोकें तुझे, उन्हें पीछे छोड़ दे।

ठोकरों में भी एक अजीब सी रौशनी है,
हर गिरने में छिपी नई ज़िंदगी है।
राहें भले ही अनजान और कठिन हों,
पर अपने कदम ही सबसे बड़े संगिन हों।

तो चल, भटकना भी एक आज़ादी है,
हर मोड़ पर नई सी आबादी है।
कैद से बेहतर है सफ़र का ये सिलसिला,
खो जाना ही कभी-कभी खुद को पाने का रास्ता मिला।

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