वह केवल स्त्री नहीं, एक सम्पूर्ण संसार है
वह केवल स्त्री नहीं, एक सम्पूर्ण संसार है
वह केवल स्त्री नहीं,
एक सम्पूर्ण संसार है।
उसके भीतर
प्रेम की नदियाँ बहती हैं,
संघर्ष के पर्वत खड़े रहते हैं,
और उम्मीद का आकाश
हर अंधेरे के बाद भी
नीला बना रहता है।
वह जन्म लेती है
तो घर में
एक नई धड़कन उतरती है।
उसकी छोटी-सी हँसी
दीवारों को भी जीवित कर देती है।
उसकी उँगलियाँ
जब किसी का हाथ पकड़ती हैं,
तो लगता है
जीवन ने पहली बार
ममता को छुआ है।
लेकिन दुनिया
उसे बहुत जल्दी
अपनी कठोरता सिखा देती है।
उसे बताया जाता है—
धीरे बोलो,
सिर झुकाकर चलो,
अपने सपनों को
इतनी ऊँचाई मत दो।
जैसे उसकी उड़ान
किसी को भयभीत करती हो।
लेकिन उसके भीतर
एक ऐसी रोशनी होती है
जो हर अंधेरे से लड़ना जानती है।
वह बड़ी होती है,
और अपने साथ
घर की उम्मीदें भी उठाती है।
वह अपने हिस्से की थकान छुपाकर
दूसरों की मुस्कान बचाती है।
वह माँ की चुप्पियों को समझती है,
पिता की आँखों की चिंता पढ़ लेती है,
और फिर भी
अपने आँसू अक्सर
तकिए में छुपा देती है।
वह पढ़ती है,
अपने सपनों को शब्द देती है,
और धीरे-धीरे
अपने भीतर की शक्ति पहचानने लगती है।
वह डॉक्टर बनती है
तो किसी की साँस बच जाती है।
वह अध्यापिका बनती है
तो पीढ़ियों का भविष्य बदल जाता है।
वह सैनिक बनती है
तो सीमाएँ सुरक्षित महसूस करती हैं।
वह वैज्ञानिक बनती है
तो आकाश भी छोटा पड़ जाता है।
लेकिन
इन सबके बाद भी
उसे हर दिन
अपने अस्तित्व का प्रमाण देना पड़ता है।
उसकी मेहनत से पहले
उसकी सुंदरता पर चर्चा होती है।
उसकी प्रतिभा से पहले
उसके चरित्र पर प्रश्न उठाए जाते हैं।
फिर भी
वह टूटती नहीं।
क्योंकि
वह जानती है
कि उसका मूल्य
दूसरों की सोच से तय नहीं होता।
वह प्रेम करती है
तो पूरी आत्मा से करती है।
वह रिश्ते निभाती है
तो अंत तक निभाती है।
वह टूटती भी है,
रोती भी है,
लेकिन हर बार
अपने आँसुओं से
एक नई शक्ति जन्म देती है।
अब वह बदल रही है।
अब वह
अपने सपनों को
चुपचाप मरने नहीं देगी।
अब वह
अपने आत्मसम्मान को
किसी की स्वीकृति पर निर्भर नहीं रखेगी।
वह अपनी बेटियों को
अब केवल सहना नहीं,
स्वयं के लिए खड़ा होना सिखा रही है।
वह उन्हें बता रही है—
कि शिक्षा सबसे बड़ी स्वतंत्रता है।
कि आत्मसम्मान
सबसे सुंदर आभूषण है।
कि अपने सपनों के लिए लड़ना
कमज़ोरी नहीं, साहस है।
वह अब
सिर्फ किसी की बेटी, पत्नी या माँ नहीं,
वह स्वयं
एक स्वतंत्र पहचान है।
वह नदी है—
जो हर चट्टान के बीच
अपना मार्ग बना लेती है।
वह दीप है—
जो आँधियों में भी
अपनी लौ नहीं खोता।
वह वर्षा है—
जो सूखी धरती में
फिर से जीवन भर देती है।
वह पर्वत है—
जो हर तूफान के बाद
और अधिक अडिग हो जाता है।
और यही उसकी सबसे बड़ी सुंदरता है—
वह टूटकर भी
उम्मीद बचाए रखती है,
वह रोकर भी
दूसरों को हँसाना नहीं भूलती,
वह संघर्षों के बीच भी
प्रेम करना नहीं छोड़ती।
क्योंकि
वह केवल स्त्री नहीं,
वह इस संसार की
सबसे गहरी संवेदना है।
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