आदमी मर्द नहीं होता, पैसा मर्द होता है...

आदमी मर्द नहीं होता,
पैसा मर्द होता है,
सूखी जेबों का सच अक्सर
भीड़ में ही गर्द होता है।

जिसके हाथों में सिक्कों की
खनकती हुई जागीरें हों,
उसके झूठ भी मोती लगते,
उसकी खामोशी तक हीरे हों।

कल तक जो था ठोकर जैसा,
आज वही सरताज हुआ,
बस नोटों की बारिश क्या हुई,
पत्थर भी मिज़ाज हुआ।

रिश्तों की चौखट पर अक्सर
इंसानों को तौला जाता है,
दिल कितना सच्चा है कम,
बटुआ कितना भारी — देखा जाता है।

भूखे पेट की ईमानदारी
किसे दिखाई देती है यहाँ,
इस दुनिया में चरित्र नहीं,
जेब की ऊँचाई गिनी जाती है यहाँ।

जिसके पास नहीं है दौलत,
उसकी मर्दानगी भी अधूरी है,
उसकी मेहनत सस्ती लगती,
उसकी हर कोशिश मजबूरी है।

माँ की दवा, बहन की शादी,
बच्चों के सपनों का भार,
इन सबके आगे अक्सर
टूट जाता है अंदर का संसार।

आदमी तो बस थक जाता है,
रातों में चुप रोता है,
मगर समाज की नज़रों में
पैसा ही मर्द होता है।

जिस दिन खाली हाथ दिखे तुम,
अपने भी पराये हो जाते हैं,
कल तक जो कंधे पर थे,
आज नज़रें चुराते हैं।

लेकिन सुनो—
हर सिक्के से बड़ा भी कुछ है,
जो बाज़ारों में बिकता नहीं,
वो आत्मा का साहस है,
जो हर अमीरी में दिखता नहीं।

क्योंकि असली मर्द वो नहीं
जिसके पास महल-खज़ाने हों,
असली मर्द वो होता है
जिसके भीतर इंसान बचा हो।


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