हमेशा तुम्हारी कमी रहती है...
“हमेशा तुम्हारी कमी रहती है”
— Rupesh Ranjan
तुम्हें भूल जाने की कोशिश
मैंने कई बार की,
मगर हर बार
तुम्हारी स्मृतियों ने
मेरे भीतर
एक नया मौसम जगा दिया।
कुछ लोग जीवन में आते हैं
और चले जाते हैं,
पर कुछ लोग
आत्मा में उतर जाते हैं—
तुम शायद वही थी।
आज भी
जब रात की निस्तब्धता
धीरे-धीरे कमरे में उतरती है,
मैं खिड़की के पास बैठकर
आसमान को देखता हूँ,
और लगता है
जैसे चाँद भी
तुम्हारा नाम जानता हो।
तुम्हारी हँसी
अब भी मेरे दिनों में गूँजती है,
जैसे किसी पुराने मंदिर में
बची हुई आरती की ध्वनि।
तुम्हारी आँखों की नमी,
तुम्हारे हाथों की ऊष्मा,
तुम्हारे अधरों पर ठहरी
धीमी-सी मुस्कान—
सब कुछ अब भी
मेरे भीतर जीवित है।
कभी-कभी सोचता हूँ,
क्या प्रेम सचमुच समाप्त हो जाता है?
यदि हो जाता,
तो तुम्हारे जाने के बाद भी
मेरे शब्द
तुम तक पहुँचने की कोशिश क्यों करते?
मैंने दुनिया की भीड़ में
खुद को बहुत व्यस्त दिखाया,
पर सच्चाई यह है कि
हर मुस्कान के पीछे
तुम्हारी अनुपस्थिति का
एक अथाह सन्नाटा था।
तुम्हारे बिना
शहर वैसा नहीं लगता,
बारिश वैसी नहीं लगती,
यहाँ तक कि
मेरी कविताएँ भी अधूरी लगती हैं।
तुम्हारी याद
किसी पीड़ा की तरह नहीं,
बल्कि
एक पवित्र आदत की तरह
मेरे साथ रहती है।
मैं तुम्हें हर दिन याद करता हूँ—
सुबह की पहली रोशनी में,
दोपहर की थकी हुई धूप में,
और रात के अंतिम पहर तक।
तुम्हें याद करना
अब मेरे लिए
साँस लेने जैसा हो गया है।
शायद इसी का नाम प्रेम है—
जहाँ दूरी हार जाती है,
समय थक जाता है,
मगर प्रतीक्षा
जीवित रहती है।
यदि कभी
मेरे शब्द तुम तक पहुँचें,
तो इतना जान लेना—
इस विशाल संसार में
एक हृदय आज भी
तुम्हें उतनी ही शिद्दत से याद करता है।
और शायद
आख़िरी साँस तक करता रहेगा।
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