परिंदों जैसी चाहत थी कभी...
परिंदों जैसी चाहत थी कभी,
आसमान को छू लेने की,
हवाओं के संग बह जाने की,
बिन डर, बिन सीमा, बस जी लेने की।
खुली थी आँखों में नीली उड़ान,
ख्वाबों में था अनंत गगन,
हर सुबह लगती थी एक शुरुआत,
हर शाम में छिपा होता था नया जीवन।
पर धीरे-धीरे कुछ बदलता गया,
दीवारें ऊँची होती चली गईं,
खिड़कियाँ छोटी पड़ती गईं,
और साँसें जैसे सिमटती चली गईं।
जिसे घर समझा था कभी,
वो एक बंद दरवाज़ा निकला,
जहाँ रोशनी भी इजाज़त लेकर आए,
और सन्नाटा ही साथी बनकर ठहरा।
अब आदत सी हो गई है
पिंजरे को घर कहने की,
खामोशी को अपना मान लेने की,
और खुद से ही दूर रहने की।
अब ख्वाब भी धीरे-धीरे
सिमटकर कोनों में छिप जाते हैं,
उड़ान की बातें सुनकर भी
दिल डरकर पीछे हट जाते हैं।
कभी सोचता हूँ, क्या यही था जीवन?
क्या इसी के लिए जन्म लिया था मैंने?
या कहीं वो हौसला खो गया है,
जो कभी मेरी रगों में बहता था।
दीवारों पर उकेरे हैं कुछ निशान,
मेरे अधूरे सपनों के,
हर खरोंच एक कहानी है,
जो बताती है मेरे संघर्षों के।
दरवाज़ा सामने है,
पर खुलता नहीं,
या शायद मैं ही अब
उसे खोलना नहीं चाहता।
क्योंकि बाहर की दुनिया
अब अनजानी लगती है,
और ये कैद ही
अब पहचान सी लगती है।
पर दिल के किसी कोने में
अब भी एक आवाज़ उठती है,
जो कहती है—
"तू बना ही उड़ने के लिए है, रुकने के लिए नहीं।"
वो आवाज़ याद दिलाती है
मेरे असली होने को,
मेरी खोई हुई पहचान को,
मेरे उस साहस को जो कहीं सो गया है।
शायद एक दिन मैं फिर
उस दरवाज़े को खोल दूँगा,
इन दीवारों को पीछे छोड़
खुद को आज़ाद कर दूँगा।
फिर से परिंदों सा उड़ूँगा,
फिर से आसमान को छू लूँगा,
और इस बार किसी भी पिंजरे को
अपना घर नहीं कहूँगा।
क्योंकि अब समझ आया है—
कैद में जीना जीना नहीं होता,
और सच्ची खुशी वहीं मिलती है
जहाँ दिल को उड़ने की इजाज़त होती है।
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