दर्द की इस भीगी धरती पर, आइए कुछ शब्द बोते हैं...
दर्द की इस भीगी धरती पर,
आइए कुछ शब्द बोते हैं,
आप भी अपने मन की कहिए,
हम भी अपने घाव खोलते हैं।
शायद इन टूटी आवाज़ों में,
कोई मरहम छिपा हुआ होगा,
शायद बिखरे हुए एहसासों में,
जीने का कारण मिला होगा।
आप भी कहिए अपने दिल की,
मैं भी सब कुछ कह देता हूँ,
क्योंकि भीतर जो सन्नाटा है,
वह हर दिन थोड़ा मरता हूँ।
कितनी रातें जागी होंगी,
कितने आँसू सूखे होंगे,
कितने सपने टूट गए होंगे,
कितने अपने रूठे होंगे।
दर्द किसी का छोटा कब था,
हर चेहरा इक कहानी है,
बाहर से जो हँसता दिखता,
भीतर उसकी वीरानी है।
कोई माँ की याद में रोता,
कोई अधूरी चाहत में,
कोई अपनों के बदल जाने पर,
कोई अपनी ही आदत में।
किसी के हिस्से तन्हाई है,
किसी के हिस्से भीड़ मिली,
किसी ने चाहा प्रेम बहुत,
पर केवल उसे पीर मिली।
हम सब चलते रहते हैं बस,
चेहरे पर मुस्कान लिए,
और भीतर इक टूटा मौसम,
हज़ारों तूफ़ान लिए।
इसलिए कहता हूँ तुमसे,
चुप रहने से क्या होगा,
दर्द अगर भीतर सड़ जाए,
तो जीवन भी धुआँ होगा।
तुम भी अपने घाव सुनाओ,
मैं भी अपनी कथा कहूँ,
जो पत्थर दिल पर रखे हुए,
आज उन्हें थोड़ा बहने दूँ।
कभी-कभी तो शब्दों में भी,
ईश्वर जैसी शक्ति होती,
एक सच्ची संवेदना ही,
मुरझाई साँसों को धोती।
जब कोई चुपचाप सुन ले,
बिन आँके, बिन दोष दिए,
तब लगता है इस दुनिया में,
अब भी कुछ रिश्ते जीवित हैं।
दर्द बाँटने से घटता है,
यह केवल कहावत नहीं,
यह उन आँखों की सच्चाई है,
जिनमें अब भी राहत नहीं।
तुम कह देना अपनी थकनें,
मैं अपनी बेचैनी कह दूँ,
तुम अपने बिखरे सपने कहना,
मैं अपनी वीरानी कह दूँ।
फिर देखो यह भारी मन भी,
थोड़ा हल्का हो जाएगा,
अंदर जमा हुआ बरसों का,
सागर बहता जाएगा।
क्योंकि इंसाँ पत्थर तो नहीं,
जिसमें एहसास नहीं होते,
कुछ ज़ख्म उम्र भर रहते हैं,
पर फिर भी लोग नहीं रोते।
चलो आज यह नियम बदल दें,
आँसू को सम्मान मिले,
जो भीतर से टूट रहा है,
उसको भी पहचान मिले।
आप भी कहिए अपने दिल की,
मैं भी सब कुछ कहता हूँ,
क्योंकि दर्द बहुत गहरा है,
और मैं भी अब थकता हूँ।
पर शायद इस साझा पीड़ा में,
कुछ उजियारा जन्मेगा,
जब एक हृदय दूसरे के दुःख को,
अपना समझकर थामेगा।
तब शायद यह बोझिल जीवन,
थोड़ा सरल हो जाएगा,
और बिखरा हुआ मन फिर से,
धीरे-धीरे जुड़ जाएगा।
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