“किताब, कदम और क्रांति”

“किताब, कदम और क्रांति”

एक घर था…
जहाँ खिड़की खुलती थी—
पर हवा आधी ही आती थी…
वहीं एक बच्ची थी—
जिसकी आँखों में पूरा आसमान था,
पर उसकी उड़ान…
दीवारों से टकरा जाती थी।

किसने तय किया
कि उसके कदम कितने होंगे?
किसने नापी उसकी हदें
बिना उसके सपनों को सुने?

क्या उसका जन्म—
सिर्फ आँकड़ा है?
या एक संभावना—
जिसे तुमने अभी पहचाना नहीं?

वो रोज़ देखती थी—
सड़क के उस पार एक स्कूल…
जहाँ घंटी बजती थी
और सपने पंक्तियों में बैठते थे।
उसकी उँगलियाँ
हवा में अक्षर बनातीं—
क… ख… ग…
और फिर मिटा देतीं—
जैसे किसी ने कह दिया हो,
“ये तुम्हारे लिए नहीं।”

पर सुनो—
सपने कभी किसी के नहीं होते…
सपने बस होते हैं!

एक दिन—
उसने डर से बड़ा कदम रखा,
और कदम से बड़ा इरादा।
दरवाज़ा खोला—
तो बाहर रास्ता नहीं,
एक सवाल खड़ा था…

“चलोगी?”

वो चली।

पहला कदम—
काँपता हुआ…
दूसरा—
थोड़ा संभलता हुआ…
तीसरा—
आत्मविश्वास से भरा हुआ…

और फिर—
कदम नहीं,
रास्ते बनने लगे!

जब उसके हाथों में
पहली किताब आई—
तो वो सिर्फ कागज़ नहीं था…
वो उसकी चाबी थी।
चाबी—
बंद दरवाज़ों की…
चाबी—
खामोशियों की…
चाबी—
उस पहचान की
जिसे दुनिया ने छुपा रखा था।
हर पन्ना—
एक खिड़की!
हर अक्षर—
एक रोशनी!

वो पढ़ी—
तो समझी!
वो समझी—
तो बोली!
वो बोली—
तो बदली!

और जब वो बदली—
तो समाज को बदलना पड़ा!

वो डॉक्टर बनी—
तो धड़कनों को नया अर्थ मिला!
वो इंजीनियर बनी—
तो पुल सिर्फ नदियों पर नहीं, सोचों पर बने!
वो शिक्षक बनी—
तो पीढ़ियों ने आँखें खोलीं!

पर ये कहानी…
हर घर की क्यों नहीं?
क्यों अब भी
किताबें अलमारी में बंद हैं,
और बेटियाँ
परंपराओं में?

क्यों?

बेटी बचाओ—
क्योंकि हर साँस अधिकार है!
बेटी पढ़ाओ—
क्योंकि हर अक्षर उद्धार है!

किताब दो—
तो उड़ान मिलेगी!
मौका दो—
तो पहचान मिलेगी!

सोचो—
एक शहर…
जहाँ हर स्कूल का दरवाज़ा
हर बेटी के लिए खुला हो…
जहाँ उसकी हँसी
घंटी की तरह गूँजे…
जहाँ उसके कदम
रास्तों को नाम दें…

वो दिन आएगा—
पर इंतज़ार मत करो!

आज…
अभी…
यहीं…

एक किताब उठाओ—
एक हाथ थामो—
एक सोच बदलो…

क्योंकि—
जब किताब हाथ में आती है,
तो कदम रुकते नहीं…
और जब कदम बढ़ते हैं—
तो क्रांति होती है।

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