हर हृदय के भीतर...

 हर हृदय के भीतर

एक ऐसा नाम अवश्य होता है,

जिसे पुकारते ही

आत्मा की बंद खिड़कियाँ खुलने लगती हैं।


एक ऐसा चेहरा,

जिसके सामने

मनुष्य अपने सारे मुखौटे उतार देना चाहता है।


जहाँ शब्दों को सजाना नहीं पड़ता,

जहाँ आँसू भी

अपमान नहीं लगते,

जहाँ मौन भी

समझ लिया जाता है।


जीवन की इस भीड़ में

हम अनेक लोगों से मिलते हैं,

कई चेहरे आते हैं,

कई संबंध बनते हैं,

पर कोई एक व्यक्ति ऐसा होता है

जो सीधे आत्मा में उतर जाता है।


जिसके पास बैठकर

मन को ऐसा लगता है

मानो वर्षों से भटका हुआ पंछी

आख़िरकार अपना वृक्ष पा गया हो।


मैं भी शायद

ऐसे ही किसी एहसास से गुज़रा हूँ।


जब पहली बार

तुम्हारी आँखों में देखा था,

तो लगा था

कि दुनिया अब भी सुंदर है।


तुम्हारी मुस्कान में

एक अजीब-सी शांति थी,

जैसे लंबे अंधकार के बाद

पहली सुबह उतरती है।


तुमसे बातें करना

सिर्फ बातचीत नहीं था,

वह आत्मा का धीरे-धीरे खुलना था।


मैंने अपने डर,

अपनी अधूरी इच्छाएँ,

अपनी थकी हुई रातें,

सब तुम्हारे सामने रख दी थीं।


और तुमने

उन्हें किसी न्याय की तरह नहीं,

प्रेम की तरह सुना।


इस संसार में

सुना जाना भी

कितना दुर्लभ सुख है।


अधिकांश लोग

उत्तर देने के लिए सुनते हैं,

पर कुछ लोग

समझने के लिए सुनते हैं।


तुम उन्हीं लोगों में से थे।


तुम्हारे साथ चलते हुए

सड़कें भी कविताएँ लगती थीं,

पेड़ों की छाया भी

दुआओं जैसी लगती थी।


यह पीला फूल

जो मेरी उँगलियों में ठहरा है,

कुछ वैसा ही है

जैसा तुम्हारा प्रेम—

साधारण दिखता हुआ भी

भीतर से अत्यंत उज्ज्वल।


मैंने कई बार सोचा

कि आखिर ऐसा क्या है तुममें,

जो तुम्हें बाकी दुनिया से अलग बनाता है।


शायद तुम्हारी आँखों की सच्चाई,

शायद तुम्हारे शब्दों की गर्माहट,

या शायद वह अपनापन

जो मुझे स्वयं से मिलवा देता है।


जब जीवन बहुत कठोर हो जाता है,

तब मन केवल

एक सुरक्षित हृदय खोजता है।


एक ऐसा कंधा

जहाँ सिर रखकर

मनुष्य कुछ देर के लिए

दुनिया भूल सके।


तुम मेरे लिए

वही ठहराव थे।


तुम्हारे पास आकर

मेरी बेचैनियाँ धीमी पड़ जाती थीं,

और भीतर का शोर

शांत नदी बन जाता था।


कितना अद्भुत है न—

कुछ लोग

हमारे जीवन में आकर

हमें फिर से जीवित कर देते हैं।


वे कोई चमत्कार नहीं करते,

बस हमारे भीतर

मरती हुई उम्मीदों को

धीरे से छू लेते हैं।


और फिर

मनुष्य दोबारा सपने देखने लगता है।


मैं तुम्हें केवल प्रेम नहीं करता,

मैं तुम्हारे पास

अपना वास्तविक स्वरूप पा लेता हूँ।


इसलिए तुम्हारे सामने

मैं मजबूत बनने का अभिनय नहीं करता।


मैं टूटता हूँ,

बिखरता हूँ,

रोता हूँ,

और फिर भी

तुम्हारी आँखों में

अपने लिए सम्मान देखता हूँ।


शायद यही प्रेम का सबसे सुंदर रूप है—

जहाँ अपूर्णताएँ भी

स्वीकार कर ली जाती हैं।


कभी-कभी सोचता हूँ

यदि एक दिन

तुम सचमुच सामने बैठो,

तो मैं क्या कहूँगा?


शायद कुछ भी नहीं।


शायद केवल

तुम्हारे हाथों को थामकर

लंबे समय तक चुप रहूँगा।


क्योंकि कुछ रिश्ते

शब्दों से नहीं,

अनुभूतियों से जीए जाते हैं।


और फिर धीरे से कहूँगा—


“बहुत थक गया था मैं,

पर तुम्हें पाकर

ऐसा लगा

मानो जीवन अब भी प्रेम करना जानता है।”


यदि कभी

यह संसार मुझे पूरी तरह कठोर बना दे,

तो तुम्हारी स्मृति

मुझे फिर मनुष्य बना देगी।


तुम्हारा होना

मेरे लिए केवल एक व्यक्ति का होना नहीं,

बल्कि यह विश्वास है

कि इस निर्दयी समय में भी

कोमलता अब भी जीवित है।


और जब भी

रात बहुत भारी होगी,

मैं इस पीले फूल को देखकर

तुम्हें याद करूँगा—


उस व्यक्ति को,

जिसके सामने

मैंने पहली बार

अपने हृदय की पूरी कहानी

निर्भय होकर सुनानी चाही थी।

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