सब कुछ एक दिन धीरे-धीरे ख़त्म हो जाता है।

सब कुछ एक दिन

धीरे-धीरे ख़त्म हो जाता है।

वक़्त की धूल

हर चीज़ को ढक लेती है—

चेहरे बदल जाते हैं,

रिश्तों की गरमाहट खो जाती है,

वादे पुराने काग़ज़ों की तरह

पीले पड़ जाते हैं।


जो लोग कभी

साँसों की तरह ज़रूरी लगते थे,

वो भी एक दिन

यादों की भीड़ में गुम हो जाते हैं।

महफ़िलें उजड़ जाती हैं,

हँसी की आवाज़ें ख़ामोश हो जाती हैं,

और इंसान

अपनी ही दुनिया में

अजनबी बन जाता है।


मगर एक चीज़ है

जो कभी पूरी तरह ख़त्म नहीं होती—

दर्द।


दर्द हर बार

नए चेहरे पहनकर लौट आता है।

कभी किसी की बेरुख़ी बनकर,

कभी अधूरी मोहब्बत बनकर,

कभी टूटी हुई उम्मीदों की सिसकी बनकर।


आप सोचते हैं

अब सब सह लिया,

अब शायद सुकून मिल जाएगा,

मगर तभी

ज़िंदगी किसी नए मोड़ पर

एक और ज़ख़्म दे देती है।


दर्द अजीब होता है,

यह इंसान को

अंदर ही अंदर खाता रहता है।

वो बाहर से मुस्कुराता है,

लोगों से बातें करता है,

अपने फ़र्ज़ निभाता है,

मगर उसकी रूह में

एक ख़ामोश मातम चलता रहता है।


कभी-कभी

कोई पुरानी याद

अचानक सामने आ जाती है,

और बरसों पुराना घाव

फिर से ताज़ा हो जाता है।

एक गीत,

एक जगह,

एक नाम,

या किसी की आवाज़—

बस इतना ही काफ़ी होता है

दिल को फिर से तोड़ देने के लिए।


दर्द का सबसे कठिन पहलू

यह नहीं कि वह तकलीफ़ देता है,

बल्कि यह है

कि वह कभी पूरी तरह जाता ही नहीं।

वह रूह के किसी कोने में

चुपचाप बैठा रहता है,

और जैसे ही इंसान

थोड़ा सुकून महसूस करता है,

वो फिर से जाग उठता है।


दुनिया कहती है—

“वक़्त सब ठीक कर देता है,”

मगर वक़्त

सिर्फ़ इंसान को

दर्द के साथ जीना सिखाता है।

कुछ ज़ख़्म ऐसे होते हैं

जो भरते नहीं,

बस इंसान

उनके साथ जीने का आदी हो जाता है।


और शायद

ज़िंदगी का सच भी यही है—

कि दर्द ख़त्म नहीं होता,

बस उसके मायने बदल जाते हैं।


कभी वह आँसू बनकर बहता है,

कभी ख़ामोशी बनकर ठहर जाता है,

और कभी

एक ऐसी मुस्कान बन जाता है

जिसके पीछे

पूरी की पूरी टूटन छिपी होती है।


मगर फिर भी

इंसान जीता रहता है,

हर नए दर्द के बाद भी,

हर टूटन के बाद भी।

शायद इसी का नाम

ज़िंदगी है—

एक ऐसा सफ़र

जहाँ सब कुछ ख़त्म हो जाता है,

मगर दर्द

कहीं न कहीं से

फिर लौट आता है।

Comments