प्रेम हो तो प्रतीक्षा जैसी हो...

 प्रेम हो तो प्रतीक्षा जैसी हो,

जो समय की लंबी गलियों में भी

अपनी आस्था नहीं खोती।


प्रेम हो तो दीपक जैसा हो,

जो आँधियों के बीच भी

किसी एक नाम के लिए जलता रहे।


आज के इस शीघ्र बदलते संसार में

लोग संबंध तो बना लेते हैं,

पर ठहरना भूल जाते हैं।


भावनाएँ अब

संदेशों की तरह छोटी हो गई हैं,

और वचन

सूचनाओं की तरह क्षणिक।


पर प्रेम…

प्रेम कभी क्षणिक नहीं होता।


वह तो आत्मा का वह वृक्ष है

जिसकी जड़ें

समय से भी गहरी होती हैं।


यदि प्रेम केवल सुविधा हो,

तो वह साथ नहीं,

एक समझौता बन जाता है।


यदि प्रेम केवल आकर्षण हो,

तो वह ऋतु की तरह बदल जाता है।


पर यदि प्रेम समर्पण हो,

तो वह मनुष्य के भीतर

प्रार्थना बनकर बसता है।


मैंने कई लोगों को देखा है

जो कहते थे—

“हमेशा साथ रहेंगे”,

पर थोड़े समय बाद

उनके शब्द भी बदल गए

और रास्ते भी।


तब समझ आया

कि प्रेम बोलने से नहीं,

निभाने से सिद्ध होता है।


प्रेम हो तो ऐसा हो

कि अनुपस्थिति में भी

उपस्थिति का अनुभव बना रहे।


कि दूरियाँ

स्मृतियों को कम न कर सकें।


कि व्यस्तताओं के बीच भी

कोई एक व्यक्ति

आपके मन में

सबसे शांत स्थान पर बसा रहे।


मैं चाहता हूँ ऐसा प्रेम

जहाँ अधिकार से अधिक

सम्मान हो।


जहाँ मौन भी

एक-दूसरे को समझ ले।


जहाँ बार-बार

अपने होने का प्रमाण न देना पड़े।


जहाँ कोई यह न पूछे—

“क्या तुम सच में मुझसे प्रेम करते हो?”

क्योंकि व्यवहार ही

उस प्रश्न का उत्तर बन जाए।


प्रेम में केवल

पास आना ही आवश्यक नहीं,

कभी-कभी

किसी के दुःख को महसूस कर लेना भी

प्रेम होता है।


जब कोई थका हो

और आप उसकी आवाज़ से ही

उसकी उदासी पहचान लें—

वह प्रेम है।


जब किसी की छोटी-सी खुशी

आपके चेहरे पर मुस्कान ले आए—

वह प्रेम है।


जब आप

किसी की कमियों के बावजूद

उसे छोड़ना न चाहें—

वह प्रेम है।


आजकल लोग

पूर्ण व्यक्ति खोजते हैं,

जबकि प्रेम

अपूर्णताओं को स्वीकार करने का नाम है।


मैंने प्रेम को

कविताओं में नहीं,

प्रतीक्षाओं में अधिक देखा है।


उस स्त्री की आँखों में

जो दरवाज़े पर खड़ी

किसी अपने की राह देखती है।


उस पुरुष की चुप्पी में

जो अपने परिवार के लिए

स्वयं को थका देता है।


उस माँ की प्रार्थनाओं में

जो हर रात

अपने बच्चों के लिए ईश्वर से बात करती है।


प्रेम केवल

“मैं तुमसे प्रेम करता हूँ” कहना नहीं,

बल्कि किसी के लिए

अपनी सुविधाएँ त्याग देना भी है।


और जो प्रेम

त्याग से डर जाए,

वह शायद केवल आकर्षण था।


यदि कभी

मुझे सच्चा प्रेम मिले,

तो मैं उसे

दुनिया की भीड़ में खोने नहीं दूँगा।


मैं उसके मौन को सुनूँगा,

उसकी थकान को समझूँगा,

उसकी आँखों में छिपे

हर छोटे दुःख को पढ़ूँगा।


क्योंकि प्रेम का अर्थ

किसी को बदलना नहीं,

बल्कि उसे

उसके वास्तविक स्वरूप में स्वीकार करना है।


मैं ऐसा प्रेम चाहता हूँ

जहाँ दोनों लोग

एक-दूसरे की कैद नहीं,

एक-दूसरे की शांति बनें।


जहाँ साथ होना

बंधन नहीं,

घर जैसा लगे।


जहाँ देर रात की बातचीतों में

सिर्फ शब्द नहीं,

विश्वास भी बहता हो।


और यदि कभी

समय कठिन हो जाए,

तो दोनों

एक-दूसरे का हाथ छोड़ने के बजाय

और मजबूती से थाम लें।


क्योंकि प्रेम का वास्तविक स्वरूप

सुख में नहीं,

संघर्ष में दिखाई देता है।


जब पूरा संसार बदल जाए

और फिर भी

कोई एक व्यक्ति

आपके लिए वैसा ही बना रहे—

वही प्रेम है।


प्रेम हो तो प्रतीक्षा जैसा हो,

जो थककर भी

आशा का दीप बुझने न दे।


प्रेम हो तो नदी जैसा हो,

जो चट्टानों से टकराकर भी

अपना प्रवाह नहीं छोड़ती।


प्रेम हो तो प्रार्थना जैसा हो,

जिसमें स्वार्थ कम

और समर्पण अधिक हो।


और प्रेम हो तो ऐसा हो

कि वर्षों बाद भी

किसी का नाम सुनते ही

हृदय उसी श्रद्धा से धड़क उठे।

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