बेफ़िक्री की नींद

बेफ़िक्री की नींद

क्यों न आज
सारे सवालों को किनारे रख दूँ,
थकी हुई यादों को
धीरे से सुला दूँ,
और अपने ही भीतर
एक खाली जगह बना दूँ—
जहाँ कुछ भी न हो,
सिवाय सुकून के।

बहुत कुछ खो चुका हूँ मैं,
या शायद
खोने का एहसास ही
अब मेरा सबसे बड़ा सच बन गया है,
हर चीज़ जो थी कभी अपनी,
अब बस एक धुंधली सी तस्वीर है,
जिसे मैं छू नहीं सकता।

शाम ढलती है
तो आसमान भी जैसे कहता है—
"छोड़ दो अब,
जो चला गया, उसे जाने दो,"
पर दिल है कि
हर डूबते सूरज के साथ
कुछ और डूब जाता है।

पहाड़ों के उस पार
जहाँ रोशनी धीमी हो जाती है,
वहीं कहीं
मेरी उम्मीदें भी ठहर जाती हैं,
छोटी-छोटी रोशनियाँ
दूर कहीं टिमटिमाती हैं,
जैसे अधूरे सपनों की आख़िरी चमक।

मैंने बहुत संभालकर रखा था
हर रिश्ते को,
हर लम्हे को,
हर मुस्कान को,
पर वक्त की उँगलियाँ
सब कुछ धीरे-धीरे
मेरे हाथों से छीन ले गईं।

अब सोचता हूँ—
क्या बचा है मेरे पास?
कुछ खामोशियाँ,
कुछ अधूरी बातें,
और एक दिल
जो अब भी धड़कता है,
पर बिना वजह।
तो क्यों न आज
मैं खुद को आज़ाद कर दूँ?

इन बोझिल ख्यालों से,
इन अधूरी उम्मीदों से,
और उस दर्द से
जो हर रात
मेरे पास लौट आता है।

क्यों न आज
मैं बेफ़िक्र होकर सो जाऊँ,
जैसे कोई बच्चा
थककर माँ की गोद में सो जाता है,
बिना इस डर के
कि सुबह क्या लाएगी।

शायद नींद में
मुझे वो सब मिल जाए
जो जागते हुए खो गया,
शायद सपनों में
कोई मुझे फिर से
अपने जैसा बना दे।

और अगर नहीं भी मिला
तो क्या फर्क पड़ता है?
अब खोने के लिए
कुछ बचा ही कहाँ है।

बस एक सुकून चाहिए—
थोड़ी देर के लिए ही सही,
एक ऐसी रात
जहाँ मैं खुद से न लड़ूँ,
जहाँ मैं बस
खामोश रह सकूँ।

और फिर
धीरे-धीरे
आँखें बंद कर लूँ,
जैसे दुनिया से नहीं,
बस अपने दर्द से
थोड़ी देर के लिए दूर जा रहा हूँ।

क्योंकि कभी-कभी
सबसे बड़ी राहत यही होती है—
कि हम कुछ देर के लिए
कुछ भी महसूस न करें।
और उस खामोशी में
शायद मैं
खुद को फिर से पा लूँ।

Comments